डॉ. कलाम की जयंती : संघर्षों से जूझे, बुलंद हौसलों से पाई मंजिल, मिसाइल मैन से राष्ट्रपति तक का तय किया सफर
15 अक्टूबर 1931 को रामेश्वरम् में हुआ था जन्म, पूरा नाम डॉ. अबुल पाकिर जैनुलाअबदीन अब्दुल कलाम था, 1962 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन में हुए शामिल, 2007 में राष्ट्रपति पद का कार्यकाल समाप्त होने के बाद अध्यापन में बिताया समय

न्यूज डेस्क, 15 अक्टूबर 2026ः
आसमान छूने की तमन्ना सभी में होती है, लेकिन कामयाब वही होते हैं, जिनके हौसले बुलंद होते हैं। 15 अक्टूबर को पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की जयंती है, जिन्हें दुनिया मिसाइल मैन के नाम से भी जानती है। डॉ. अब्दुल कलाम का जीवन काफी संघर्षपूर्ण रहा। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। उनको परिवार की छोटी-बड़ी मुश्किलों से जूझना पड़ता था। इन सब परेशानियों के बाद भी उन्होंने अपनी मेहनत और हौसले के दम पर अपने सपनों को साकार किया और दुनिया के सामने एक मिसाल पेश की। डॉ. कलाम मिसाइल मैन से भारत के राष्ट्रपति तक बने और बच्चों, आम जनता से लेकर सभी पार्टियों के प्रिय रहे।
रामेश्वर की सड़कों पर बांटते थे अखबार
डॉ. अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को रामेश्वरम् (तमिलनाडु) में एक तमिल मुस्लिम परिवार में हुआ था। इनका पूरा नाम डॉ. अबुल पाकिर जैनुलाअबदीन अब्दुल कलाम था। पिता का नाम जैनुलबदीन मराकायार था, जो एक एक स्थानीय मस्जिद के इमाम थे। उनके पास एक नाव थी, जो रामेश्वरम और धनुष्कोडी के बीच तीर्थयात्रियों को ले जाती थी। मां आशीअम्मा गृहिणी थीं। अब्दुल कलाम मदरसे में पढ़ाई करने के बाद सुबह रामेश्वरम् के रेलवे स्टेशन और बस अड्डे पर अखबार लेते थे। इसके बाद शहर भर में बांटते थे। उन्होंने बचपन में ही आत्मनिर्भर बनने की तरफ अपना कदम बढ़ा लिया था। कलाम ने 19 वर्ष की उम्र में द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका भी देखी।

मद्रास के संस्थान की एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की पढ़ाई
डॉ. कलाम ने 1955 में मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया। 1960 में यहां से स्नातक होने करने के बाद रक्षा अनुसंधान एवं विकास सेवा के सदस्य बने। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के वैमानिकी विकास प्रतिष्ठान में वैज्ञानिक के रूप में शामिल हुए। अपने प्रारंभिक करियर के दौरान वे छोटे होवरक्राफ्ट के डिजाइन में शामिल थे, लेकिन इससे वे संतुष्ट नहीं थे। इसके बाद भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति में शामिल हुए। यहां कलाम ने प्रसिद्ध अंतरिक्ष वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के साथ काम किया।

इसरो व डीआरडीओ में किया काम
1962 में डॉ. अब्दुल कलाम भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन में शामिल हुए। उनको प्रोजेक्ट डायरेक्टर के रूप में भारत का पहला स्वदेशी उपग्रह (एसएलवी तृतीय) प्रक्षेपास्त्र बनाने का श्रेय हासिल है। अब्दुल कलाम भारत के मिसाइल कार्यक्रम के जनक माने जाते हैं। उन्होंने 20 साल तक भारतीय अंतरिक्ष शोध संगठन (इसरो) में काम किया। यही नहीं रक्षा शोध और विकास संगठन (डीआरडीओ) में भी करीब 20 साल रहे। वे 10 साल तक डीआरडीओ के अध्यक्ष रहे। साथ ही उन्होंने रक्षामंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार की भूमिका भी निभाई। मिसाइल मैन ने अग्नि व पृथ्वी जैसी मिसाइल्स को स्वदेशी तकनीक से बनाया था।

2002 में भारत के राष्ट्रपति बने
18 जुलाई 2002 को कलाम भारत के 11वें राष्ट्रपति बने थे। उनको बीजेपी समर्थित एनडीए घटक दलों ने अपना उम्मीदवार बनाया था, जिसका वामदलों के अलावा समस्त दलों ने समर्थन किया था। 25 जुलाई 2002 को उन्होंने संसद भवन में राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी। 25 जुलाई 2007 को उनका कार्यकाल समाप्त हो गया था। इसके बाद उन्होंने अध्यापन, लेखन और सार्वजनिक सेवा में अपना जीवन व्यतीत किया।
शिलांग के आईआईएम में व्याख्यान देते समय हुआ था निधन
27 जुलाई 2015 को 83 वर्ष की आयु में शिलांग के आईआईएम में व्याख्यान देते समय कलाम का हृदय गति रुकने से निधन हो गया। उनके गृह नगर रामेश्वरम में आयोजित अंतिम संस्कार समारोह में हजारों लोग शामिल हुए। राजकीय सम्मान के साथ उनको दफनाया गया। 2017 में उनकी याद में रामेश्वर के पास पेई करुम्बु में डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम राष्ट्रीय स्मारक बनाया गया। इसका उद्घाटन डॉ. कलाम की दूसरी पुण्यतिथि के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था।






