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अटल बिहारी वाजपेयी पुण्यतिथि: संघर्ष से प्रधानमंत्री तक का पूरा सफर, बड़ी उपलब्धियां और चुनौतियां

पुण्यतिथि पर आज पूरे देश ने अटल बिहारी को दी श्रद्धांजलि, भाजपा ही नहीं सभी दलों से मधुर रिश्ते रखते थे अटल बिहारी वाजपेयी, पत्रकार, कवि और नेता के रूप में शोहरत बटोरी, जेल में रहे, लंबा संघर्ष किया, तीन बार प्रधानमंत्री बनने के दौरान पोखरण से कारगिल तक लिए बड़े फैसले, भारतीय राजनीति में संवाद व सहमति की उनकी शैली आज भी चर्चा में

न्यूज डेस्क, 16 अगस्त 2026:

16 अगस्त को देश पूर्व प्रधानमंत्री व भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी को याद करता है। आज उनकी आठवीं पुण्यतिथि है। दिल्ली के सदैव अटल स्मारक पर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। राजनीतिक दलों के नेताओं से लेकर आम लोग तक उनके योगदान को याद कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई नेताओं ने भी अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धांजलि दी है। उनका राजनीतिक जीवन उतार-चढ़ाव को लेकर हमेशा चर्चा में रहा।

अटल बिहारी सिर्फ प्रधानमंत्री की पहचान तक सीमित नहीं रहे

अटल बिहारी वाजपेयी की पहचान सिर्फ देश के प्रधानमंत्री के तौर पर नहीं रही। वे लंबे समय तक संसद में सक्रिय रहने वाले नेता, प्रभावशाली वक्ता, पत्रकार, कवि व भारतीय राजनीति के बड़े चेहरे रहे। ग्वालियर से शुरू हुआ उनका सफर दिल्ली की सत्ता तक पहुंचा, मगर इस रास्ते में उन्हें जेल, चुनावी हार, सरकार गिरने जैसी कई मुश्किलों से गुजरना पड़ा।

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1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौर में गिरफ्तारी से लेकर 1975 के आपातकाल तक जेल जाने का अनुभव उनके राजनीतिक जीवन का हिस्सा रहा। 1996 में प्रधानमंत्री बनने के बाद महज 13 दिन में सरकार गिर गई। 1999 में एक वोट से सत्ता हाथ से निकल गई। इसके बाद उन्होंने दोबारा चुनाव लड़ा, सत्ता में लौटे व पांच साल का कार्यकाल पूरा किया।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि 2026

घर में मिला साहित्यिक माहौल, कविताओं व भाषण से मजबूत की सार्वजनिक पहचान

अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर रियासत में हुआ था। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी शिक्षक होने के साथ कविताएं भी लिखते थे। घर के साहित्यिक माहौल का असर अटल पर बचपन से पड़ा। आगे चलकर कविता व भाषण उनकी सार्वजनिक पहचान का अहम हिस्सा बने।

ग्वालियर से कानपुर तक पढ़ाई में भी रहे आगे

अटल बिहारी वाजपेयी ने ग्वालियर में शुरुआती पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने विक्टोरिया कॉलेज से हिंदी, अंग्रेजी व संस्कृत में स्नातक की पढ़ाई की। आगे कानपुर के डीएवी कॉलेज से राजनीति शास्त्र में एमए किया। उन्होंने कानून की पढ़ाई भी शुरू की थी, लेकिन वह पूरी नहीं कर सके।

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अटल 15 साल की उम्र में RSS से जुड़े

1939 में करीब 15 साल की उम्र में अटल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े। संगठन से जुड़े काम ने उनके भीतर अनुशासन व सार्वजनिक जीवन की समझ मजबूत की। बाद में यही अनुभव उनके राजनीतिक सफर में काम आया।

अटल बिहारी को कम उम्र में ही मिला जेल का अनुभव

1942 में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी को उनके बड़े भाई प्रेम बिहारी वाजपेयी के साथ गिरफ्तार किया गया था। उस समय उनकी उम्र करीब 17 साल थी। दोनों भाइयों को बटेश्वर से पकड़ा गया था। यह अटल के जीवन में जेल से जुड़ा शुरुआती अनुभव था।

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राष्ट्रधर्म से शुरू हुआ पत्रकार के रूप में लेखन का दौर

जेल से निकलने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी पत्रकारिता से जुड़े। उन्होंने राष्ट्रधर्म, पांचजन्य, स्वदेश व वीर अर्जुन जैसे प्रकाशनों में काम किया। लेखन के जरिए उनकी राजनीतिक सोच लोगों तक पहुंची। यही दौर आगे उनके ओजस्वी भाषणों की जमीन भी बना।

अटल बिहारी का 1951 में हुआ जनसंघ से जुड़ाव

1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की। अटल बिहारी वाजपेयी इस संगठन से जुड़े प्रमुख चेहरों में शामिल हुए। दीनदयाल उपाध्याय के साथ उन्होंने संगठन को मजबूत करने के लिए काम किया। जल्द ही वे जनसंघ के प्रमुख नेताओं में गिने जाने लगे।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत का असर

1953 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी कश्मीर में परमिट व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन पर गए। इस दौरान उनकी मौत हो गई। अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीतिक जीवन में यह बड़ा झटका था। इसके बाद उन्होंने संगठन को मजबूत करने पर ज्यादा ध्यान दिया।

1957 की जीत ने संसद में बदली पहचान, तीन सीटों से चुनाव लड़ा, नेहरू भी हुए थे प्रभावित

1957 के लोकसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी ने लखनऊ, मथुरा व बलरामपुर से चुनाव लड़ा। लखनऊ व मथुरा में उन्हें हार मिली, लेकिन बलरामपुर से उन्होंने जीत दर्ज की। इसी जीत के साथ वे पहली बार लोकसभा पहुंचे। संसद में अटल के भाषणों ने जल्द ही उनकी अलग पहचान बना दी। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी उनकी भाषण शैली व तर्क रखने के तरीके से प्रभावित हुए थे। उनसे जुड़ा यह प्रसंग काफी चर्चित रहा कि नेहरू ने भविष्य में उनके प्रधानमंत्री बनने की संभावना जताई थी।

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आपातकाल में फिर जेल पहुंचे, 25 जून 1975 के बाद बदला माहौल

25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू हुआ। विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी शुरू हुई। प्रेस पर सेंसरशिप लगी। अटल बिहारी वाजपेयी भी गिरफ्तार हुए। इस दौरान उन्हें जेल व नजरबंदी में करीब 19 महीने बिताने पड़े।

अटल बिहारी 1977 में विदेश मंत्री बने

आपातकाल खत्म होने के बाद 1977 में जनता पार्टी सत्ता में आई। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। अटल बिहारी वाजपेयी को विदेश मंत्री बनाया गया। विदेश मंत्री रहते हुए उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में भाषण दिया। यह उनके राजनीतिक जीवन के यादगार क्षणों में शामिल रहा।

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अटल बिहारी 1980 में बनी भाजपा के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष बने

जनता पार्टी सरकार के भीतर मतभेद बढ़े तो पार्टी टूट गई। इसके बाद 1980 में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी समेत कई नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की। अटल इसके पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। भाजपा के शुरुआती दौर में पार्टी को बड़ा झटका 1984 के लोकसभा चुनाव में लगा।

दो सीटों से सबसे बड़ी पार्टी तक

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद बनी सहानुभूति लहर में कांग्रेस को भारी जीत मिली। भाजपा सिर्फ दो लोकसभा सीटों पर सिमट गई। इसके बावजूद संगठन ने काम जारी रखा। अगले कुछ वर्षों में भाजपा का जनाधार तेजी से बढ़ा। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात समेत कई राज्यों में पार्टी मजबूत हुई। 1996 के लोकसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई। यही वह पड़ाव था जहां अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता खुला।

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अटल बिहारी तीन बार प्रधानमंत्री बने, हर बार कहानी अलग रही

1996 में सिर्फ 13 दिन की सरकार

1996 के लोकसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी, मगर बहुमत से दूर रही। 16 मई 1996 को अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। बहुमत जुटाना मुश्किल हुआ। विश्वास मत से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उनकी सरकार सिर्फ 13 दिन चली।

13 दिन की सरकार बनी यादगार

पहली सरकार का कार्यकाल छोटा था, लेकिन उस दौरान दिया गया अटल का भाषण भारतीय संसदीय राजनीति में लंबे समय तक चर्चा में रहा। उन्होंने सत्ता बचाने के लिए अनैतिक जोड़तोड़ का रास्ता नहीं चुना। बहुमत न होने पर उन्होंने पद छोड़ दिया।

1998 में दूसरी बार प्रधानमंत्री

1998 के लोकसभा चुनाव के बाद अटल बिहारी वाजपेयी दूसरी बार प्रधानमंत्री बने। इस बार उन्होंने कई क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर एनडीए सरकार बनाई। सरकार करीब 13 महीने चली।

एक वोट से गिर गई सरकार

1999 में एआईएडीएमके ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। अटल सरकार को विश्वास मत का सामना करना पड़ा। मतदान में सरकार के पक्ष में 269 वोट पड़े, जबकि विपक्ष को 270 वोट मिले। इस तरह सरकार सिर्फ एक वोट से गिर गई।

1999 में तीसरी बार वापसी

सरकार गिरने के बाद 1999 में लोकसभा चुनाव हुए। एनडीए को इस बार स्पष्ट जनादेश मिला। 13 अक्टूबर 1999 को अटल बिहारी वाजपेयी ने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद संभाला। इस बार उन्होंने पांच साल का पूरा कार्यकाल पूरा किया।

अटल बिहारी ने पोखरण परीक्षण कर दुनिया को दिखाया दम, प्रतिबंधों से नहीं डिगे

मई 1998 में अटल सरकार ने राजस्थान के पोखरण में परमाणु परीक्षण किए। इस अभियान को पोखरण-II के नाम से जाना गया। भारत ने पांच परमाणु परीक्षण किए। इसके बाद अमेरिका समेत कई देशों ने भारत पर प्रतिबंध लगाए। अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद अटल सरकार अपने फैसले पर कायम रही। भारत ने अपनी परमाणु नीति को सुरक्षा व आत्मरक्षा से जोड़कर पेश किया। पोखरण परीक्षणों के बाद भारत की रणनीतिक ताकत को लेकर दुनिया का नजरिया बदला।

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लाहौर बस यात्रा के बाद कारगिल की बड़ी चुनौती

फरवरी 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी ने दिल्ली से लाहौर की बस यात्रा की। उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मुलाकात की। दोनों देशों के रिश्ते सुधारने की कोशिश हुई। यह यात्रा अटल की विदेश नीति का बड़ा प्रतीक बनी। लाहौर यात्रा के कुछ ही महीनों बाद कारगिल में पाकिस्तानी सैनिकों व घुसपैठियों की मौजूदगी का पता चला। मई 1999 से भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय शुरू किया। अटल सरकार ने सेना को नियंत्रण रेखा पार न करने का निर्देश दिया।

26 जुलाई को कारगिल वॉर में मिली बड़ी कामयाबी

भारतीय सेना ने कठिन परिस्थितियों में कारगिल की चोटियों पर कब्जा जमाए बैठे घुसपैठियों को पीछे धकेला। 26 जुलाई 1999 को भारत ने ऑपरेशन विजय की कामयाबी घोषित की। इसी दिन को हर साल कारगिल विजय दिवस के तौर पर याद किया जाता है।

स्वर्णिम चतुर्भुज ने दी रोड कनेक्टिविटी, चार बड़े शहरों को जोड़ा, कारोबार को मिली नई रफ्तार

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के बड़े Infrastructure Projects में स्वर्णिम चतुर्भुज शामिल रहा। इसके तहत दिल्ली, मुंबई, चेन्नई व कोलकाता को करीब 5,846 किलोमीटर लंबे हाईवे नेटवर्क से जोड़ने का काम हुआ। बेहतर सड़क कनेक्टिविटी का असर माल ढुलाई, कारोबार व यात्रा पर पड़ा। लंबे सफर का समय कम हुआ। इस प्रोजेक्ट को देश के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर कार्यक्रमों में गिना जाता है।

अटल बिहारी की PMGSY योजना से गांवों तक बिछा सड़कों का जाल

साल 2000 में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) शुरू हुई। इसका मकसद ग्रामीण इलाकों में पक्की सड़क कनेक्टिविटी पहुंचाना था। इस योजना ने दूरदराज के गांवों को मुख्य सड़कों से जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई।

सर्व शिक्षा अभियान की हुई शुरुआत

अटल सरकार के दौर में सर्व शिक्षा अभियान शुरू हुआ। इसका लक्ष्य बच्चों को प्राथमिक शिक्षा से जोड़ना था। आगे चलकर देश की शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी कई नीतियों में इस अभियान का असर दिखाई दिया।

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मोबाइल से लेकर आर्थिक सुधार तक कई बड़े फैसले:

Telecom Sector में हुए बदलाव

अटल सरकार के दौर में दूरसंचार क्षेत्र में बड़े बदलाव हुए। निजी कंपनियों के लिए इस सेक्टर में मौके बढ़े। इसका असर मोबाइल सेवाओं के विस्तार पर पड़ा। आने वाले वर्षों में मोबाइल फोन आम लोगों तक तेजी से पहुंचा।

आर्थिक अनुशासन पर रहा फोकस

सरकारी कंपनियों में विनिवेश को लेकर भी अटल सरकार ने फैसले किए। 2003 में Fiscal Responsibility and Budget Management Act लाया गया। इसका मकसद सरकारी वित्तीय प्रबंधन में अनुशासन बढ़ाना था।

अटल बिहारी ने 24 दलों की गठबंधन सरकार चलाकर दिखाया कमाल

1999 से 2004 तक अटल बिहारी वाजपेयी ने कई दलों के साथ गठबंधन सरकार चलाई। अलग-अलग राज्यों व राजनीतिक दलों के अपने हित थे। ऐसे में हर मुद्दे पर सहमति बनाना आसान नहीं था। इसके बावजूद सरकार ने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया।

अटल बिहारी का चार दशक से ज्यादा रहा संसद से रिश्ता

अटल बिहारी वाजपेयी लंबे समय तक संसद का हिस्सा रहे। वे लोकसभा के कई कार्यकालों में सांसद रहे, साथ ही राज्यसभा में भी पहुंचे। करीब चार दशक से ज्यादा के संसदीय जीवन में उन्होंने विपक्ष से लेकर सरकार तक कई अहम भूमिकाएं निभाईं।

विरोधियों से संवाद की शैली रही अनूठी, कवि के रूप में अलग से हासिल की शोहरत

अटल की राजनीति की एक खास पहचान संवाद रही। वे विपक्ष के नेताओं के साथ राजनीतिक मतभेद रखते हुए भी व्यक्तिगत रिश्ते बनाए रखते थे। उनकी भाषण शैली में कटाक्ष, गंभीरता व सहजता का मिला-जुला अंदाज दिखता था। अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ नेता नहीं, कवि भी थे। उनकी कविताओं में देश, समाज, जीवन के संघर्ष व मानवीय भावनाओं की झलक मिलती है। उनकी कई रचनाएं बाद में गीतों के रूप में भी लोकप्रिय हुईं। संसद में उनके भाषणों में भी कविता की झलक दिखाई देती थी। कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में वे शब्दों के जरिए अपनी बात सहज तरीके से रखने के लिए जाने जाते थे। यही वजह है कि उनकी भाषण शैली आज भी राजनीतिक अध्ययन का हिस्सा है।

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अटल बिहारी ने नहीं की शादी, परिवार को लेकर अलग दिखा फैसला

अटल बिहारी वाजपेयी ने शादी नहीं की। उन्होंने राजकुमारी कौल के परिवार से करीबी संबंध बनाए रखे। उनकी बेटी नमिता भट्टाचार्य को उन्होंने बेटी की तरह स्नेह दिया। निजी जीवन को लेकर वे हमेशा अपेक्षाकृत शांत रहे।

2004 के बाद धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से बनाई दूरी, चुनावी हार के बाद बदली भूमिका

2004 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को हार मिली। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री पद से बाहर हो गए। वे लखनऊ से सांसद बने रहे। दिसंबर 2005 में उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बनाने का ऐलान किया। 2009 के बाद उनकी सेहत लगातार कमजोर हुई। उन्हें बोलने व याददाश्त से जुड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। इसके बाद उनका सार्वजनिक जीवन लगभग खत्म हो गया।

अटल बिहारी ने 16 अगस्त 2018 को दुनिया को कहा अलविदा

जून 2018 में अटल बिहारी वाजपेयी को किडनी संक्रमण व सांस लेने में दिक्कत के बाद दिल्ली एम्स में भर्ती कराया गया। करीब दो महीने इलाज चलने के बाद 16 अगस्त 2018 को 93 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

भारत रत्न से सम्मानित हुआ उनका योगदान

2015 में मिला सर्वोच्च नागरिक सम्मान अटल बिहारी वाजपेयी को 1992 में पद्म विभूषण मिला था। 1994 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ सांसद का सम्मान दिया गया। 27 मार्च 2015 को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया।

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25 दिसंबर को सुशासन दिवस

केंद्र सरकार ने 2014 में अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन 25 दिसंबर को सुशासन दिवस के तौर पर मनाने का फैसला किया। इसके बाद हर साल इस दिन उनके प्रशासनिक विचारों व सार्वजनिक जीवन को याद किया जाता है।

उत्तर प्रदेश से रहा गहरा रिश्ता

अटल बिहारी वाजपेयी का उत्तर प्रदेश से खास रिश्ता रहा। बलरामपुर से उनकी पहली लोकसभा जीत हुई। बाद में लखनऊ उनकी प्रमुख राजनीतिक कर्मभूमि बना। लंबे समय तक वे लखनऊ से सांसद रहे। यही वजह है कि अटल बिहारी वाजपेयी पुण्यतिथि पर उत्तर प्रदेश में भी उन्हें खास तौर पर याद किया जाता है।

अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीति से जुड़े 6 बड़े सवाल

– अटल बिहारी वाजपेयी कितनी बार प्रधानमंत्री बने?

अटल बिहारी वाजपेयी तीन बार भारत के प्रधानमंत्री बने। पहली बार 1996 में उनकी सरकार 13 दिन चली। दूसरी बार 1998 से 1999 तक वे प्रधानमंत्री रहे। तीसरी बार 1999 से 2004 तक उन्होंने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया।

– अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि कब होती है?

अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि हर साल 16 अगस्त को मनाई जाती है। 16 अगस्त 2018 को दिल्ली एम्स में उनका निधन हुआ था।

– अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न कब मिला?

उन्हें 27 मार्च 2015 को भारत रत्न दिया गया। यह देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।

– अटल बिहारी वाजपेयी की बड़ी उपलब्धियां क्या रहीं?

उनके कार्यकाल में पोखरण परमाणु परीक्षण, कारगिल युद्ध के दौरान राजनीतिक नेतृत्व, स्वर्णिम चतुर्भुज, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, सर्व शिक्षा अभियान व Telecom Sector में बड़े बदलाव हुए।

– अटल बिहारी वाजपेयी कितने समय जेल में रहे?

1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया था। आपातकाल के दौरान 1975 से 1977 के बीच भी वे जेल व नजरबंदी में रहे। दोनों दौर उनके राजनीतिक जीवन के अहम संघर्षों में शामिल रहे।

– सुशासन दिवस कब मनाया जाता है?

हर साल 25 दिसंबर को सुशासन दिवस मनाया जाता है। यह दिन अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर उनके प्रशासनिक विचारों व सार्वजनिक जीवन को याद करने के लिए मनाया जाता है।

– अटल बिहारी वाजपेयी की विरासत आज भी क्यों अहम है

राजनीति में अलग तरह की पहचान और अटल बिहारी वाजपेयी का राजनीतिक सफर हार, सत्ता, विपक्ष, गठबंधन व संकट से होकर गुजरा। 13 दिन की सरकार से लेकर पांच साल के कार्यकाल तक उनके सफर में भारतीय राजनीति के कई अहम मोड़ दिखाई देते हैं।

अटल बिहारी जिनके बिना अधूरा है भारतीय राजनीति का इतिहास

उनकी विरासत में सड़क परियोजनाएं, ग्रामीण कनेक्टिविटी, शिक्षा, परमाणु नीति व विदेश नीति से जुड़े फैसले शामिल हैं। इसके साथ उनकी संसदीय भाषा, विरोधियों से संवाद व कविता की पहचान भी जुड़ी है। अटल बिहारी वाजपेयी पुण्यतिथि 2026 पर उन्हें याद करने की वजह यही है कि भारतीय राजनीति के कई अहम अध्याय आज भी उनके नाम से जुड़े हुए हैं। यही वजह है कि उनके बोलने का अंदाज, शब्द व विचार के साथ उनकी शैली आज भी राजनीति में अलग पहचान रखती है।

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Anand Sharma

आनंद शर्मा 30 वर्ष से अधिक समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। ‘राष्ट्रीय सहारा’ व ‘हिंदुस्तान’ दैनिक समाचार पत्र में फील्ड रिपोर्टिंग के साथ सम्पादन का काम भी चलता रहा। जिला स्तर पर संवाददाता और ब्यूरो प्रमुख के रूप में लंबे समय तक सक्रिय रहे। इस दौरान विख्यात… More »

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