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Birth Anniversary: हादसे ने छीनी आंख…21 साल में बने कप्तान, जानिए नवाब पटौदी की जिंदगी के दिलचस्प किस्से

मंसूर अली खान पटौदी ने एक आंख की रोशनी खोने के बावजूद अपने साहस, कप्तानी और प्रदर्शन से भारतीय क्रिकेट को नई पहचान दी। 2793 रन, ऐतिहासिक विदेशी जीत और दमदार विरासत के साथ आज भी क्रिकेट इतिहास में अमर हैं

खेल डेस्क, 5 जनवरी 2026:

कुछ खिलाड़ी मैदान पर सिर्फ रन नहीं बनाते, बल्कि इतिहास रचते हैं। भारतीय क्रिकेट के ऐसे ही ‘टाइगर’ थे मंसूर अली खान पटौदी-जिनका नाम रिकॉर्ड्स से कहीं आगे, उनके साहस, नेतृत्व और शख्सियत की वजह से अमर हुआ। 5 जनवरी 1941 को भोपाल में जन्में पटौदी को नवाब पटौदी जूनियर के रूप में भी जाना जाता था। अपने आक्रामक खेल, बेहतरीन कप्तानी और मजबूत इरादों के कारण उन्होंने क्रिकेट जगत में अलग पहचान बनाई। एक समय ऐसा था जब मैदान पर उनकी मौजूदगी ही विरोधी टीमों के लिए चुनौती बन जाती थी।

हादसा जिसने आंख छीनी, हौसला नहीं

टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण से पहले इंग्लैंड के काउंटी सीजन के दौरान होव शहर में पटौदी एक भीषण सड़क हादसे का शिकार हो गए। इस दुर्घटना में कार का शीशा उनकी दाई आंख में घुस गया, जिससे उनकी आंख की रोशनी चली गई। डॉक्टरों ने उन्हें क्रिकेट छोड़ने की सलाह दी, लेकिन पटौदी ने हार मानने से इनकार कर दिया। हादसे के महज पांच महीने बाद उन्होंने 1961 में दिल्ली में इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट डेब्यू कर सभी को चौंका दिया।

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एक आंख से खेली ऐतिहासिक पारी

एक आंख की रोशनी खोने के बावजूद पटौदी ने करीब 14 वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेला और गेंदबाजों की जमकर धुनाई की। उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में अपनी बाई आंख के सहारे छह शतक लगाए। यह जज्बा उन्हें खास बनाता है, क्योंकि उस दौर में ऐसी वापसी किसी चमत्कार से कम नहीं मानी जाती थी।

कम उम्र में कप्तानी की जिम्मेदारी

अपने करियर के शुरुआती दौर में ही पटौदी को बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी गई। महज तीन टेस्ट मैच खेलने के बाद उन्हें भारतीय टीम का कप्तान बना दिया गया। 21 साल 77 दिन की उम्र में वह टेस्ट क्रिकेट के सबसे युवा कप्तान बने। वेस्टइंडीज दौरे के दौरान तत्कालीन कप्तान नारी कॉन्ट्रैक्टर के चोटिल होने के बाद उन्हें टीम की कमान सौंपी गई। इसके बाद पटौदी लंबे समय तक भारतीय टीम के नेतृत्वकर्ता बने रहे।

कप्तानी में रचा गया इतिहास

पटौदी ने भारतीय टीम की कप्तानी करते हुए 40 टेस्ट मैच खेले, जिनमें भारत को 9 जीत और 19 हार का सामना करना पड़ा। हालांकि उनकी कप्तानी में भारतीय क्रिकेट को नई दिशा मिली। साल 1968 में न्यूजीलैंड में भारत की पहली विदेशी टेस्ट जीत उनकी कप्तानी में ही दर्ज हुई। यह उपलब्धि भारतीय क्रिकेट इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती है।

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दमदार करियर और निजी जिंदगी

मंसूर अली खान पटौदी ने भारत के लिए 46 टेस्ट मैचों में 83 पारियों में 2793 रन बनाए, उनका औसत 34.91 रहा। उन्होंने 1975 में वेस्टइंडीज के खिलाफ मुंबई में अपना अंतिम टेस्ट खेला। मैदान के बाहर उनकी शादी भी खूब चर्चा में रही। अभिनेत्री शर्मिला टैगोर के साथ उनकी प्रेम कहानी सुर्खियों में रही। दोनों ने 27 दिसंबर 1968 को विवाह किया, जिसके बाद शर्मिला टैगोर ने इस्लाम धर्म अपनाकर आयशा नाम रखा। 2011 में लंबी बीमारी के बाद 70 वर्ष की उम्र में मंसूर अली खान पटौदी का निधन हो गया, लेकिन उनका नाम भारतीय क्रिकेट में हमेशा जीवित रहेगा।

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