लखनऊ, 1 मार्च 2026 :
मथुरा के महावन में रविवार को भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं की पावन धरती गोकुल छड़ीमार होली के रंगों में सराबोर हो उठी। जहां पारंपरिक लठमार होली की तरह लाठियां नहीं, बल्कि प्रेम और भक्ति से भरी छोटी-छोटी छड़ियां बरसीं, तो वहां का नजारा देखते ही बनता था। यह अनोखी होली ब्रज की होली परंपरा का एक खास हिस्सा है, जो श्रीकृष्ण की बाल अवस्था को याद दिलाती है-जब वे घुटनों के बल चलते थे, इसलिए उनके साथ ‘छड़ी’ से ही होली खेली जाती है। ब्रज की होली का यह रूप बताता है कि यहां होली सिर्फ रंगों की नहीं, बल्कि भक्ति, प्रेम और परंपरा की होती है। जहां आराध्य को बालक मानकर छड़ी से हल्के प्रेम वार किए जाते हैं।
मुरलीधर घाट पर पुजारी मथुरा दास ने उतारी ठाकुरजी की आरती
सुबह लगभग 10 बजे नंद भवन (नंदकिला) से ठाकुरजी का डोला निकाला गया। जिसमें भगवान कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम के दिव्य स्वरूप शोभायमान थे। डोला बीच चौक और नंद चौक होते हुए मुरलीधर घाट पहुंचा, जहां भगवान कृष्ण ने पहली बार बंसी बजाई थी। मंदिर के सेवायत पुजारी मथुरा दास ने ठाकुरजी की भव्य आरती उतारी। गोकुलवासियों ने गली-गली में डोले का फूलों की बरसात से स्वागत किया। डोले के साथ चलते श्रद्धालु झूम-झूमकर नाच रहे थे, जयघोष कर रहे थे-‘जय कन्हैयालाल की!’, ‘राधे-राधे!’ की गूंज हर तरफ फैल गई।

हुरियारों पर बरसीं प्रेम पगी छड़ियां
डोला के मुरलीधर घाट पहुंचते ही छड़ीमार होली का असली रंग उभरा। सैकड़ों गोकुल की ग्वालिनें (हुरियारिन) सजी-धजी, केसर-दूध पीकर तैयार खड़ी थीं। उन्होंने कान्हा स्वरूप हुरियारों (ग्वालों) पर प्रेम से छड़ियां बरसाईं। हंसी-ठिठोली, रंग-गुलाल और छड़ी की हल्की-फुल्की मार के बीच पूरा माहौल भक्ति और उल्लास से भर गया। चारों तरफ सतरंगी गुलाल उड़ने लगा, टेसू के फूलों से बने प्राकृतिक रंग में लोग सराबोर होकर झूमते रहे। रसियाओं के गीत गूंजे-‘होरी खेलन आए कान्हा।
ठसाठस भरी थीं गोकुल की संकरी गलियां
गोकुल की इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचे थे। गोकुल की संकरी गलियां ठसाठस भरी हुई थीं। कई विदेशी पर्यटक भी रंग-गुलाल लगाकर इस दिव्य उत्सव का हिस्सा बने। गोकुल की यह होली न सिर्फ रंगों का त्योहार है, बल्कि भगवान कृष्ण के साथ ग्वाल-ग्वालिनों के प्रेमपूर्ण संबंधों का जीवंत चित्रण है।






