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जीविका के संघर्ष में तप रहा कुम्हारों का जीवन… पसीना पीकर गला तर करते हैं मेहनत के ‘मटके’

गर्मी बढ़ते ही मटकों और सुराही की मांग तेज, बढ़ती लागत और कच्चे माल की कमी से जूझ रहा कुम्हार समाज, सरकारी सुविधाओं ने भी मुंह मोड़ा, घट रही कुम्हारों की संख्या

एमएम खान

मोहनलालगंज (लखनऊ), 14 मार्च 2026:

गर्मी की शुरुआत होते ही बाजार में मिट्टी के मटकों और सुराही की मांग बढ़ने लगती है। ठंडे पानी से गला तर करने के लिए लोग आज भी मिट्टी के बर्तनों को तरजीह देते हैं, लेकिन इन बर्तनों के पीछे कुम्हारों की लंबी मेहनत और संघर्ष छिपा रहता है। बढ़ती लागत, कच्चे माल की कमी और मशीन से बने प्लास्टिक व धातु के बर्तनों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच कुम्हार समाज अपने पारंपरिक काम को बचाए रखने की कमरतोड़ कोशिश कर रहा है।

आज बदले दौर में फ्रिज कॉमन बात हो गईं है लेकिन आज भी एक बड़ा तबका और जरूरत वाली जगहों पर मिट्टी के मटके भी प्रयोग किए जाते है। इनकी आपूर्ति कुम्हार समाज ही करता है क्योंकि कोई मटका किसी फैक्ट्री में तैयार नहीं होता। कड़ी मेहनत और हाथों के हुनर से तैयार होने वाले इन मिट्टी के मटकों का गांव से बाजार तक का सफर बेहद संघर्ष भरा है। इसी संघर्ष से रूबरू होने के लिए ‘द हो हल्ला’ लखनऊ और रायबरेली की सीमा पर स्थित मोहनलालगंज के सिदौली गांव पहुंचा।

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इस गांव में करीब 15 से 20 कुम्हार परिवार रहते हैं। इन परिवारों की रोजी-रोटी मिट्टी के बर्तनों पर ही निर्भर है। यहां तैयार होने वाले मटके और अन्य बर्तन लखनऊ, रायबरेली और उन्नाव तक भेजे जाते हैं। ‘द हो हल्ला’ ने इस गांव में रहने वाले कुम्हारों से मुलाकात की और उनकी जीविका और उसके लिए होने वाले संघर्ष को साझा किया।

नहीं मिला योजनाओं का लाभ, हाथ से घुमाते हैं चॉक, चोरी छिपे लानी पड़ती है मिट्टी

कुम्हार मुस्ताक बताते हैं कि वे आज भी हाथ से चॉक घुमाकर बर्तन बनाते हैं। उनका कहना है कि सरकारी योजनाओं में इलेक्ट्रॉनिक चाक और मिट्टी के तालाब देने की बात कही जाती है, लेकिन उन्हें अब तक इसका लाभ नहीं मिला। मिट्टी के लिए उन्हें इधर-उधर से इंतजाम करना पड़ता है। कई बार चोरी छिपे मिट्टी लानी पड़ती है। बर्तन पकाने के लिए कंडे भी बाजार से खरीदने पड़ते हैं।

50 रुपए लागत, बिक्री 70 में, कैसे चलाएं परिवार

मुस्ताक के अनुसार एक मटका बनाने में करीब 50 रुपये तक का खर्च आ जाता है, जबकि बाजार में यह 60 से 70 रुपये में ही बिक पाता है। मेहनत के मुकाबले कम कमाई होने से परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो जाता है। इसी इलाके की रेशमा, तौफीक, अतीक और रिजवान सहित कई कुम्हारों ने भी बताया कि उन्हें किसी सरकारी योजना से सीधी मदद नहीं मिली। हाथ से चाक चलाने के कारण अक्सर हाथों में दर्द और सूजन भी हो जाती है।

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प्रकृति देती है कच्चा माल, बाकी अपनी मेहनत

मिट्टी का मटका बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह प्राकृतिक कच्चे माल पर निर्भर करती है। कुम्हार पहले दूर-दूर से मिट्टी लाकर घर पहुंचाते हैं। इसके बाद मिट्टी से कंकड़ और खर-पतवार निकालकर उसे अच्छी तरह गूंथा जाता है। फिर उसमें बालू मिलाकर उसे तैयार किया जाता है। इसके बाद हाथों से दो हिस्सों में आकार दिया जाता है और चाक पर रखकर मटके का ढांचा तैयार किया जाता है। दोनों हिस्सों को जोड़कर धूप में सुखाया जाता है। सूखने के बाद इन्हें कंडों की आग में करीब पांच से छह दिन तक पकाया जाता है। तब जाकर एक मटका पूरी तरह तैयार होता है।

साल भर में कमाई के मिलते हैं दो बड़े मौके

निगोहां के कुम्हार चांदनी व अतीक बताते हैं कि साल में कमाई के केवल दो बड़े मौके मिलते हैं। दीपावली के समय दीये और गर्मी के मौसम में मटकों की बिक्री होती है। बारिश के दिनों में नमी के कारण बर्तन ठीक से सूख नहीं पाते, जिससे काम लगभग ठप हो जाता है। कुम्हारों के सामने सबसे बड़ी समस्या मिट्टी की उपलब्धता की है। इसके अलावा बाजार भी सीमित है। कच्चा माल अलग-अलग जगहों से खरीदना पड़ता है, जिससे लागत बढ़ जाती है। तैयार बर्तन बेचने के लिए उन्हें एक जिले से दूसरे जिले तक जाना पड़ता है। बढ़ती मुश्किलों के कारण कुम्हार समुदाय के कुछ लोग अब दूसरे कामों की ओर भी रुख करने लगे हैं, जबकि कई लोग रोजी-रोटी के लिए पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं।

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