Uttar Pradesh

कोरोना संकट से निकली आत्मनिर्भरता की राह… सुजाता को पूजा सामग्री के कारोबार से मिली पहचान

अलीगढ़ की सुजाता ने कोविड काल में पति की नौकरी छूटने के बाद स्वयं सहायता समूह को बनाई अपनी ताकत, डिजिटल प्लेटफॉर्म के सहारे देशभर तक पहुंचा ‘श्री शुभांग’ ब्रांड

लखनऊ, 14 मार्च 2026:

कोरोना काल कई परिवारों के लिए मुश्किल समय लेकर आया था, लेकिन अलीगढ़ की सुजाता राघव ने उसी दौर को अपने लिए नए मौके में बदल दिया। हरदुआगंज क्षेत्र के बड़ा गांव उखलाना की रहने वाली सुजाता ने हालात से हार मानने के बजाय काम शुरू करने का फैसला किया और आज उनका छोटा सा प्रयास कई महिलाओं के लिए रोज़गार का जरिया बन चुका है।

कोरोना के दौरान उनके पति की नौकरी चली गई थी। घर की आमदनी अचानक रुक गई तो परिवार के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया। इसी बीच उन्हें राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने गांव की महिलाओं को साथ लेकर स्वयं सहायता समूह बनाया और छोटा सा कारोबार शुरू किया।

शुरुआत में बनाई पूजा सामग्री

समूह से जुड़ने के बाद सुजाता को शुरुआती पूंजी मिली, जिससे उन्होंने पूजा सामग्री बनाने का काम शुरू किया। शुरुआत सूती बातियों से हुई, जो मिट्टी के दीयों में इस्तेमाल होती हैं। धीरे धीरे मांग बढ़ी तो उत्पाद भी बढ़ते गए। बाद में धूपबत्ती, छह तरह की धूप स्टिक, आठ तरह के धूप कोन, हवन सामग्री, सत्यनारायण पूजा किट और जन्माष्टमी पूजा किट जैसे कई उत्पाद तैयार किए जाने लगे।

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से बढ़ा कारोबार

समूह की पहचान बनाने के लिए उन्होंने अपने उत्पादों को ‘श्री शुभांग’ नाम से ब्रांड किया और इसका ट्रेडमार्क भी पंजीकृत कराया। आज उनके उत्पाद मंदिरों, किराना दुकानों और सरकारी कैंटीन तक पहुंच रहे हैं। समय के साथ सुजाता ने अपने उत्पादों को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से भी जोड़ दिया। अमेजन, फ्लिपकार्ट और जियो मार्ट जैसे ई कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर रजिस्ट्रेशन कराया। इसके साथ ही ओएनडीसी प्लेटफॉर्म से भी कारोबार को जोड़ा गया। इससे उनके उत्पाद जिला स्तर से निकलकर देश के कई हिस्सों तक पहुंचने लगे। शुरुआत में डिजिटल तकनीक समझना आसान नहीं था, लेकिन एनआरएलएम टीम और परिवार के सहयोग से उन्होंने इसे सीख लिया। अब मोबाइल पर ऑर्डर आते हैं और ऑनलाइन कैटलॉग के जरिए ग्राहक सीधे उत्पाद देख कर ऑर्डर कर लेते हैं।

कई महिलाओं को मिला रोजगार

सुजाता की पहल से आज गांव की कई महिलाओं को काम मिला है। उनके समूह से करीब 10 महिलाएं सीधे तौर पर जुड़ी हैं, जबकि पैकिंग और सप्लाई जैसे कामों से अन्य महिलाएं भी जुड़ रही हैं। समूह से जुड़ी महिलाएं हर महीने लगभग 7 से 8 हजार रुपये तक कमा रही हैं। समूह की कुल मासिक आमदनी अब एक लाख रुपये से ऊपर पहुंच चुकी है। सुजाता का कहना है कि जब महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी होती हैं तो पूरे परिवार की स्थिति बदल जाती है। उनकी कोशिश है कि आगे और महिलाओं को इस काम से जोड़ा जाए ताकि गांव में रोजगार के नए मौके बन सकें।

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