लखनऊ, 20 अप्रैल 2026:
लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े संशोधन विधेयक के गिरने के बाद सियासी माहौल गरमा गया है। इस मुद्दे को लेकर विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। महिलाएं इसे अपने अधिकारों पर सीधा प्रहार बता रही हैं। यह विधेयक लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने से जुड़ा था। इसे लेकर अब विपक्ष पर आधी आबादी का हक छीनने का आरोप लगाया जा रहा है।
भाजपा की महिला नेताओं ने विपक्ष खासकर सपा और कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। उनका कहना है कि विपक्ष महिलाओं के सशक्तिकरण से घबराया हुआ है और सिर्फ अपने परिवार की महिलाओं को ही राजनीति में आगे बढ़ाना चाहता है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह पूरी राजनीति परिवारवाद से ग्रस्त है। इसमें आम महिलाओं के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी जाती।
प्रदेश की मंत्री बेबी रानी मौर्य ने विपक्ष को कठघरे में खड़ा करते हुए सवाल किया कि आखिर अखिलेश यादव महिलाओं को संसद में क्यों नहीं देखना चाहते? उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि क्या केवल डिंपल यादव को ही संसद में जाने का अधिकार है या फिर उत्तर प्रदेश और देश की अन्य महिलाओं को भी समान अवसर मिलना चाहिए।

वहीं, मंत्री विजय लक्ष्मी गौतम ने कहा कि आज देश के सर्वोच्च पदों पर महिलाएं कार्यरत होने के साथ राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में महिलाओं के हित में ऐतिहासिक काम हुए हैं जिनमें मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक जैसी कुप्रथा से मुक्ति दिलाना भी शामिल है। ऐसे में जब महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित करने का समय आया तो विपक्ष ने अपना वास्तविक चेहरा दिखा दिया।

प्रदेश की मंत्री रजनी तिवारी ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह जानबूझकर हर सकारात्मक पहल में बाधा डालता है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा चलाई जा रही महिला कल्याण योजनाओं से विपक्ष पहले ही असहज है। अब आरक्षण से महिलाओं के सशक्तिकरण और तेज होने को वे रोकना चाहते हैं।

भाजपा विधायक अदिति सिंह ने भी विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि जब एक महिला सशक्त होती है तो उसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि संसद में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से देश के विकास को नई गति मिलती लेकिन विपक्ष को अपने राजनीतिक हितों के चलते यह स्वीकार नहीं है।

महिला आरक्षण विधेयक का गिरना अब सिर्फ एक संसदीय घटना नहीं अपितु एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। इसमें महिला अधिकार बनाम परिवारवाद की सीधी लड़ाई देखने को मिल रही है।






