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24 साल बाद इंसाफ : नोएडा पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह के पिता के तीन हत्यारों को उम्रकैद

लखनऊ के बहुचर्चित हत्याकांड में सीबीआई कोर्ट ने शूटर कालिया समेत तीनों दोषियों को सुनाई सजा, 30-30 हजार रुपये का जुर्माना, मुकदमे के दौरान तीन आरोपियों की हो गई थी मृत्यु

लखनऊ, 8 जुलाई 2026:

करीब 24 साल पुराने बहुचर्चित लखनऊ बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष इंद्रदेव सिंह हत्याकांड में आखिरकार इंसाफ की मुहर लग गई। सीबीआई की विशेष अदालत ने नोएडा पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह के पिता इंद्रदेव की हत्या के दोषी शूटर विक्रम यादव उर्फ कालिया, उसके साथी पन्ना सिंह और ब्रजेश कुमार यादव उर्फ मुन्ना को हत्या और आपराधिक साजिश का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने तीनों पर 30-30 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।

इंद्रदेव सिंह
इंद्रदेव सिंह

लखनऊ बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष थे इंद्रदेव

सीबीआई के विशेष न्यायाधीश वायु नंदन मिश्रा ने यह फैसला सुनाया। इससे पहले 30 जून को अदालत ने तीनों को दोषी करार दिया था। दोष सिद्ध होने के बाद जमानत पर चल रहे पन्ना सिंह और ब्रजेश कुमार यादव की जमानत निरस्त कर उन्हें जेल भेज दिया गया था। शूटर कालिया पहले से ही जेल में बंद था। मंगलवार को तीनों को जेल से कोर्ट में पेश किया गया, जहां सजा सुनाई गई।

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लक्ष्मी सिंह
लक्ष्मी सिंह

सुनवाई के दौरान सीबीआई के विशेष लोक अभियोजक केपी सिंह ने साक्ष्यों के आधार पर अदालत में प्रभावी पैरवी की। फैसले के दौरान इंद्रदेव सिंह की बेटी एवं वर्तमान नोएडा पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह अपनी मां नयनतारा के साथ अदालत में मौजूद रहीं।

कलेक्ट्रेट के पीछे 8 अगस्त 2002 को हुआ था मर्डर

यह हत्याकांड 8 अगस्त 2002 का है। महानगर निवासी इंद्रदेव सिंह कचहरी से स्कूटर पर घर लौट रहे थे। कलेक्ट्रेट के पीछे वाली सड़क पर स्कूटर सवार बदमाशों ने उन्हें गोली मार दी, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। घटना के बाद उनकी पत्नी नयनतारा ने कैसरबाग थाने में तत्कालीन भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मंत्री राम कुमार वर्मा (अब दिवंगत), सुरजन लाल वर्मा, डॉ. सुषमा वर्मा और सुरेश वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी लेकिन जांच में उनकी भूमिका नहीं मिली।

सीबीआई की विवेचना में शूटर कालिया, पन्ना सिंह, ब्रजेश कुमार यादव, लेखपाल मन्ना लाल, वेद प्रकाश उर्फ नेता और छोटेलाल उर्फ छोटू के नाम सामने आए। मुकदमे के दौरान मन्ना लाल, वेद प्रकाश और छोटेलाल की मृत्यु हो गई।

इस बहुचर्चित मामले में कुल 80 गवाह थे लेकिन केवल 50 की ही गवाही हो सकी। इनमें छह गवाहों की मौत हो गई, पांच का पता नहीं चल सका और पांच गवाह अपने बयान से मुकर गए। तमाम चुनौतियों के बावजूद 24 साल बाद आए इस फैसले ने लंबे समय से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे परिवार को बड़ी राहत दी।

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