कांशीराम पुण्यतिथि : नौकरी छोड़ी, बहुजन आंदोलन खड़ा कर सत्ता के समीकरण बदले… आइए जानें कांशीराम की वह राजनीति जिसने मायावती को CM बनाया
Kanshi Ram Mayawati : 15 मार्च 1934 को पंजाब के रूपनगर में जन्म, पुणे की सरकारी नौकरी छोड़कर सामाजिक आंदोलन की राह चुनी, BAMCEF और DS-4 के बाद 14 अप्रैल 1984 को BSP बनाई, चुनावी राजनीति के लिए तीन चरणों की रणनीति बताई, 1993 में सपा के साथ सरकार और 1995 में बीजेपी के समर्थन से मायावती को मुख्यमंत्री बनाकर यूपी की राजनीति का चेहरा बदल दिया, 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पुण्यतिथि

न्यूज डेस्क, 9 अक्टूबर 2026:
Bahujan Samaj Party : बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की 9 अक्टूबर को पुण्यतिथि है। यूपी की राजनीति में यह तारीख सिर्फ एक बड़े दलित नेता को याद करने का दिन नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक सफर को देखने का मौका भी है जिसने वंचित तबकों को सत्ता में हिस्सेदारी की राजनीति का रास्ता दिखाया। कांशीराम ने सरकारी नौकरी से निकलकर सामाजिक संगठन खड़ा किया, फिर उसे राजनीतिक ताकत में बदला और मायावती को आगे करके उत्तर प्रदेश में दलित महिला नेतृत्व का नया अध्याय लिखा। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बसपा इस बार उनकी पुण्यतिथि पर लखनऊ स्थित कांशीराम स्मारक स्थल पर प्रदेशभर के मंडलों और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी सुनिश्चित करने में जुटी है।
पंजाब के रूपनगर से शुरू हुआ सफर
Kanshi Ram Biography : कांशीराम का जन्म 15 मार्च 1934 को पंजाब के रूपनगर जिले में हुआ था। उन्होंने रोपड़ के सरकारी कॉलेज से 1956 में बीएससी की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने पुणे स्थित Explosives Research and Development Laboratory में नौकरी की। यही नौकरी आगे चलकर उनके जीवन की दिशा बदलने वाली साबित हुई। नौकरी के दौरान उन्हें सामाजिक और जातिगत भेदभाव से जुड़ी घटनाओं का सामना करना पड़ा और डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का उन पर गहरा असर पड़ा।

नौकरी के दौरान भेदभाव से फूटा आंदोलन
Kanshi Ram Politics : कांशीराम ने सरकारी नौकरी को जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं माना। एक कर्मचारी के साथ डॉ. आंबेडकर जयंती पर छुट्टी को लेकर हुए भेदभाव की घटना के बाद उन्होंने उसके पक्ष में आवाज उठाई। कर्मचारी की नौकरी बहाल कराने और आंबेडकर जयंती की छुट्टी बहाल कराने के लिए उन्होंने संघर्ष किया। इसी दौर में उनके भीतर यह विचार मजबूत हुआ कि केवल व्यक्तिगत तरक्की से बदलाव नहीं आएगा, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संगठन खड़ा करना होगा। 1964 में उन्होंने नौकरी छोड़कर सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन को अपना जीवन समर्पित कर दिया।
BAMCEF से बहुजन संगठन की नींव
कांशीराम ने 1971 में ऑल इंडिया बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज एम्प्लॉईज फेडरेशन यानी BAMCEF की नींव रखी। इसका मकसद सरकारी सेवाओं में मौजूद दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक कर्मचारियों को सामाजिक चेतना और बहुजन विचारधारा से जोड़ना था। बाद के वर्षों में BAMCEF कांशीराम के संगठन निर्माण की पहली बड़ी सीढ़ी बना। इसी नेटवर्क के जरिए उन्होंने यह समझ विकसित की कि सरकारी व्यवस्था में मौजूद शिक्षित और नौकरीपेशा तबका सामाजिक बदलाव के लिए बड़ी भूमिका निभा सकता है।
DS-4 ने आंदोलन को दी राजनीतिक दिशा
सरकारी कर्मचारी सीधे राजनीतिक गतिविधियों में नहीं उतर सकते थे। इसलिए कांशीराम ने 1981 में दलित शोषित समाज संघर्ष समिति यानी DS-4 का गठन किया। यह संगठन सामाजिक जागरण और राजनीतिक लामबंदी का माध्यम बना। कांशीराम का लक्ष्य सिर्फ किसी एक जाति को संगठित करना नहीं था। वह दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदायों को एक बड़े बहुजन सामाजिक आधार के रूप में देख रहे थे।

‘द चमचा युग’ में दिखी कांशीराम की राजनीतिक सोच की धार
संगठन खड़ा करने के साथ कांशीराम वैचारिक स्तर पर भी अपनी राजनीति को स्पष्ट कर रहे थे। 1982 में उन्होंने द चमचा युग यानी The Chamcha Age नाम की किताब लिखी। इसमें उन्होंने ऐसे दलित नेताओं की आलोचना की, जिन्हें वह बड़े राजनीतिक दलों के सहारे आगे बढ़ने वाला नेतृत्व मानते थे। किताब में उन्होंने ‘चमचा’ शब्द के जरिए उस राजनीति पर सवाल उठाया, जिसमें उनके मुताबिक दलित नेतृत्व अपने स्वतंत्र राजनीतिक एजेंडे के बजाय दूसरी पार्टियों पर निर्भर रहता है। पुस्तक 24 सितंबर 1982 को प्रकाशित हुई थी। इसी दौर में कांशीराम ने अपनी राजनीति का एक और आधार स्पष्ट किया। उनका जोर इस बात पर था कि बहुजन समाज को अपने स्वतंत्र संगठन और राजनीतिक ताकत के जरिए सत्ता में हिस्सेदारी हासिल करनी चाहिए। उनकी किताब Birth of BAMCEF भी इसी संगठनात्मक और वैचारिक दौर से जुड़ी महत्वपूर्ण सामग्री मानी जाती है।

14 अप्रैल 1984 को किया BSP का गठन
कांशीराम ने 14 अप्रैल 1984 को डॉ. आंबेडकर की जयंती के दिन बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की। BAMCEF से शुरू हुआ सामाजिक नेटवर्क और DS-4 से तैयार राजनीतिक जमीन अब एक राजनीतिक पार्टी में बदल चुकी थी। उनका साफ जोर था कि जिन समुदायों की संख्या ज्यादा है, उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी भी उसी अनुपात में होनी चाहिए। इसी सोच से उनका चर्चित नारा सामने आया- ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।’
चुनावी राजनीति के लिए तीन फॉर्मूले बताए
BSP बनने के बाद कांशीराम ने चुनावी राजनीति को सिर्फ तत्काल जीत-हार के नजरिए से नहीं देखा। उनसे जुड़ा एक चर्चित राजनीतिक फॉर्मूला था कि पहला चुनाव हारने के लिए, दूसरा चुनाव लोगों की नजर में आने के लिए और तीसरा चुनाव जीतने के लिए लड़ा जाता है। बाद के वर्षों में उनके इस कथन का कई राजनीतिक नेताओं और विश्लेषकों ने उल्लेख किया। इसका मतलब था कि नई पार्टी को चुनाव दर चुनाव अपना संगठन, पहचान और जनाधार बढ़ाते हुए आगे बढ़ना चाहिए। इस रणनीति का असर BSP के शुरुआती चुनावी सफर में भी दिखाई दिया। 1984 में पार्टी ने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा और शुरुआती दौर में उसे बड़ी सफलता नहीं मिली। लेकिन चुनावों के जरिए पार्टी ने अपना राजनीतिक आधार बढ़ाना शुरू किया।

1988 में वीपी सिंह के खिलाफ उतरे
कांशीराम ने 1988 में इलाहाबाद लोकसभा सीट के उपचुनाव में तत्कालीन राष्ट्रीय राजनीति के बड़े चेहरे वीपी सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ा। इस चुनाव में वीपी सिंह को 2,02,996 वोट मिले, जबकि कांशीराम को 69,517 वोट हासिल हुए और वह तीसरे स्थान पर रहे। वोटों की संख्या भले जीत के लिए पर्याप्त नहीं थी, लेकिन इस चुनाव ने कांशीराम और BSP को राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चा में जगह दिलाई। यहीं कांशीराम की चुनावी रणनीति का वह हिस्सा भी दिखा जिसमें बड़े नेताओं के खिलाफ चुनाव लड़कर अपनी पार्टी और संगठन को पहचान दिलाने की कोशिश की गई। इसके बाद उन्होंने 1989 में पूर्वी दिल्ली से भी लोकसभा चुनाव लड़ा।
शासित नहीं, शासक बनने की राजनीति
कांशीराम की राजनीति का मूल विचार था कि दलित और वंचित समाज सिर्फ वोट देने वाला समूह बनकर न रहे, बल्कि सत्ता के फैसलों में उसकी भागीदारी हो। वह बहुजन समाज को ‘शासित’ की स्थिति से निकालकर ‘शासक’ बनाने की बात करते थे। उनसे जुड़ा एक विचार था- ‘जिस समाज में जन्म लिया है, उसे बदलने के लिए काम करो।’ उनके लिए सामाजिक सम्मान, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सत्ता में हिस्सेदारी एक-दूसरे से जुड़े मुद्दे थे।
1991 में इटावा से पहली बड़ी चुनावी जीत
कांशीराम को पहली लोकसभा चुनावी सफलता 1991 में इटावा से मिली। मुलायम सिंह यादव के साथ बने राजनीतिक समीकरण ने इसमें भूमिका निभाई। यही वह दौर था जब यूपी की राजनीति में बसपा और समाजवादी धारा के बीच नई संभावनाएं बन रही थीं। 1993 के विधानसभा चुनाव तक यह समीकरण खुलकर सामने आया और कांशीराम तथा मुलायम सिंह यादव ने साथ आकर यूपी की राजनीति में बड़ा गठजोड़ खड़ा किया।

1993 में सपा के साथ सरकार
1993 के विधानसभा चुनाव में एसपी और बसपा ने मिलकर चुनावी समीकरण बनाया। दोनों दलों ने मिलकर 176 सीटें हासिल कीं और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने। यह गठजोड़ यूपी की राजनीति में दलित और पिछड़े सामाजिक आधारों को एक साथ लाने की कोशिश के रूप में देखा गया। कांशीराम के लिए यह सिर्फ चुनावी समझौता नहीं था, बल्कि सत्ता के जरिए बहुजन राजनीति को आगे बढ़ाने का प्रयोग भी था।
दो साल में बदल गया सत्ता का समीकरण
एसपी-बसपा सरकार ज्यादा समय नहीं चल सकी। जून 1995 में बसपा ने मुलायम सिंह यादव सरकार से समर्थन वापस ले लिया। इसके बाद लखनऊ के स्टेट गेस्ट हाउस में मायावती और बसपा विधायकों के साथ हुई हिंसक घटना ने दोनों दलों के रिश्तों को लंबे समय के लिए बदल दिया। गेस्ट हाउस कांड के बाद बसपा और एसपी के बीच गहरी राजनीतिक दूरी पैदा हुई। इसी घटना के बाद कांशीराम ने बीजेपी के समर्थन से मायावती को सत्ता तक पहुंचाने का फैसला किया।
बीजेपी के समर्थन से मायावती मुख्यमंत्री
3 जून 1995 को मायावती ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। वह देश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनीं। कांशीराम के राजनीतिक प्रयोग का यह सबसे बड़ा परिणाम था। जिस आंदोलन को उन्होंने सरकारी कर्मचारियों के बीच सामाजिक जागरण से शुरू किया था, उसका नेतृत्व अब राज्य की सत्ता तक पहुंच चुका था। मायावती बाद में चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं और 2007 से 2012 तक पूरे पांच साल का कार्यकाल भी पूरा किया।

राजनीति में कोई स्थायी दोस्त-दुश्मन नहीं
कांशीराम की राजनीति में सत्ता के समीकरण परिस्थिति के हिसाब से बदलते रहे। उन्होंने एसपी के साथ गठबंधन किया, फिर उससे अलग होकर बीजेपी के समर्थन से बसपा सरकार बनवाई। कांग्रेस के साथ भी अलग-अलग मौकों पर राजनीतिक समीकरण बने। उनका जोर इस बात पर था कि बहुजन समाज को सत्ता के केंद्र से दूर रखकर सामाजिक बदलाव का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। इसलिए उनकी राजनीति में चुनावी गठबंधन और सत्ता में भागीदारी को रणनीतिक साधन के तौर पर देखा गया।
बीजेपी से सरकार बनाई, संसद में उसके खिलाफ भी खड़े हुए
यह भी कांशीराम की राजनीति की एक खास विशेषता थी कि किसी दल के साथ सत्ता का समीकरण बनने का मतलब यह नहीं था कि उसके हर राजनीतिक रुख का समर्थन किया जाए। 1998 और 1999 में केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के विश्वास मत के दौरान बसपा के रुख ने यह साफ किया। 1999 में वाजपेयी सरकार एक वोट से विश्वास मत हार गई और बसपा के सांसदों ने सरकार के खिलाफ मतदान किया। इससे साफ था कि यूपी में बीजेपी के समर्थन से सरकार बनाने और केंद्र में बीजेपी सरकार के समर्थन के सवाल को कांशीराम अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में देखते थे।

मायावती से मुलाकात ने बदल दिया आंदोलन का चेहरा
कांशीराम के राजनीतिक सफर में मायावती का प्रवेश निर्णायक मोड़ साबित हुआ। उस समय मायावती वकालत की पढ़ाई के साथ आईएएस की तैयारी कर रही थीं। कांशीराम उनके भाषण से प्रभावित हुए और उनसे मिलने उनके घर तक पहुंचे। उन्होंने मायावती को राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया। मायावती ने भी उनके मिशन के लिए अपना करियर छोड़कर सक्रिय राजनीति का रास्ता चुना।
विरोध के बावजूद मायावती को आगे बढ़ाया
कांशीराम ने मायावती को लगातार आगे बढ़ाया। पार्टी के भीतर कई बड़े नेताओं को उनका इस तरह उभरना पसंद नहीं था और विरोध भी हुआ, लेकिन कांशीराम ने अपने फैसले में बदलाव नहीं किया। उन्होंने मायावती को संगठन और चुनावी राजनीति में आगे बढ़ाया और धीरे-धीरे उन्हें अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में तैयार किया। 2003 के बाद जब कांशीराम की सक्रिय राजनीतिक भूमिका कम हुई तो मायावती के हाथों में बसपा की कमान और मजबूत हो गई।

मूर्तियों को लेकर भी हुई चर्चा
मायावती सरकार के दौरान बनाए गए स्मारकों में कांशीराम और मायावती की प्रतिमाएं साथ लगाए जाने पर भी राजनीतिक चर्चा हुई। मायावती खुद इस संदर्भ में कहती रही हैं कि कांशीराम प्रोग्रेसिव सोच रखते थे और उन्होंने उनसे अपनी प्रतिमा भी उनके साथ लगाने को कहा था। इस पूरे प्रसंग को कांशीराम और मायावती के लंबे राजनीतिक संबंध तथा उनके उत्तराधिकार की राजनीति से जोड़कर देखा गया।
कांशीराम के लेखन और भाषण भी बने राजनीतिक विरासत का हिस्सा
कांशीराम की विरासत सिर्फ चुनावी राजनीति और संगठन तक सीमित नहीं रही। उनके लेखन और भाषणों को बाद में अलग-अलग पुस्तकों और संकलनों में भी संरक्षित किया गया। उनकी किताब The Chamcha Age और Birth of BAMCEF उनके विचारों को समझने के प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं। उनके भाषणों का संकलन बहुजन नायक कांशीराम के अविस्मरणीय भाषण नाम से किया गया। कांशीराम के लेखन और भाषणों का एक अन्य संकलन एसएस गौतम और एआर अकेला ने किया। वहीं उनके संपादकीय लेखों का संकलन The Editorials of Kanshi Ram नाम से 1997 में बहुजन समाज पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया।
विचारों से निकली वह राजनीतिक विरासत
कांशीराम का निधन 9 अक्टूबर 2006 को नई दिल्ली में हुआ। जिस दिन उनकी पुण्यतिथि आती है, उसी दिन उनकी बनाई राजनीतिक धारा अपने संस्थापक की विरासत को याद करती है। उनके नारों और विचारों में सामाजिक प्रतिनिधित्व, राजनीतिक हिस्सेदारी और सत्ता में भागीदारी प्रमुख थी। ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ आज भी बहुजन राजनीति में सबसे ज्यादा उद्धृत किए जाने वाले नारों में शामिल है।
2027 से पहले फिर कांशीराम के नाम पर लामबंदी
इस बार 9 अक्टूबर की पुण्यतिथि का राजनीतिक संदर्भ इसलिए भी अहम है क्योंकि उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव सामने है। बसपा प्रमुख मायावती ने आज प्रदेश के सभी मंडलों के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को लखनऊ स्थित कांशीराम स्मारक स्थल पहुंचकर श्रद्धासुमन अर्पित करने के निर्देश दिए हैं। अलग-अलग जिलों में पार्टी की बैठकें कर कार्यकर्ताओं को लखनऊ पहुंचाने की तैयारी पहले ही कर ली गई थी। इस तरह कांशीराम की पुण्यतिथि पर होने वाला कार्यक्रम श्रद्धांजलि के साथ बसपा के संगठन को जमीन पर सक्रिय करने के मौके के रूप में भी सामने आ रहा है।
नौ अक्टूबर की तारीख में छिपी पूरी राजनीतिक कहानी
कांशीराम के जीवन को सिर्फ एक दलित नेता या बसपा संस्थापक की कहानी के तौर पर देखना उनके राजनीतिक प्रयोग को छोटा कर देगा। सरकारी नौकरी से निकला एक कर्मचारी पहले सामाजिक संगठन बनाता है, फिर कर्मचारियों और वंचित तबकों को जोड़ता है, DS-4 के जरिए आंदोलन को राजनीतिक दिशा देता है, BSP बनाकर चुनावी मैदान में उतरता है, एसपी के साथ सरकार बनाता है, उससे अलग होकर बीजेपी के समर्थन से मायावती को मुख्यमंत्री बनाता है और फिर केंद्र में उसी बीजेपी सरकार के खिलाफ बसपा का रुख तय करता है। यही पूरा सफर कांशीराम की राजनीति का वह ‘माला’ है, जिसकी हर कड़ी अलग दिखती है लेकिन धागा एक ही है- बहुजन समाज को राजनीतिक ताकत और सत्ता में हिस्सेदारी दिलाना।





