योगेंद्र मलिक
देहरादून, 7 फरवरी 2026:
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में स्थित टपकेश्वर महादेव मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था और प्रकृति के खूबसूरत तालमेल की मिसाल है। गढ़ी कैंट इलाके में असन नदी के किनारे बसी यह प्राकृतिक गुफा वर्षों से शिवभक्तों को अपनी ओर खींचती रही है। यहां गुफा की छत से टपकता पानी स्वयंभू शिवलिंग पर गिरता है, मानो प्रकृति खुद भगवान शिव का अभिषेक कर रही हो।
टपकेश्वर महादेव मंदिर देहरादून घाटी के गढ़ी कैंट क्षेत्र में असन नदी के तट पर स्थित है। असन नदी यमुना की सहायक नदी है, जो इस पूरे इलाके को हरियाली और ठंडक देती है। मंदिर एक प्राकृतिक चूना पत्थर की गुफा में स्थित है। गुफा करीब 50 फुट लंबी और 20 फुट चौड़ी है। इसकी छत से लगातार गिरने वाली जलधारा सीधे शिवलिंग पर पड़ती है। खास बात यह है कि गर्मियों के मौसम में भी पानी का यह प्रवाह नहीं रुकता, जो इसे और भी विशेष बनाता है।
लोक मान्यता के अनुसार, यह वही द्रोण गुफा है जहां गुरु द्रोणाचार्य ने तपस्या की थी। कहा जाता है कि उनके पुत्र अश्वत्थामा की शिवभक्ति से प्रसन्न होकर शिवलिंग से दूध की धारा बहने लगी थी। बाद में यह धारा जल में बदल गई, लेकिन आस्था आज भी वैसी ही बनी हुई है। कुछ कथाओं में यह भी कहा जाता है कि पांडवों ने वनवास के दौरान यहां कुछ समय बिताया था। शिव पुराण में वर्णित स्वयंभू शिवलिंगों में टपकेश्वर का नाम लिया जाता है, जो बिना किसी मानवीय स्थापना के प्रकट हुआ माना जाता है।

मंदिर की गुफा में प्रवेश करते ही एक अलग ही माहौल महसूस होता है। बाहर की चहल-पहल से दूर, भीतर शांति और ठंडक है। गुफा के अंदर का तापमान साल भर लगभग एक जैसा रहता है। परिसर में गणेश, पार्वती, कार्तिकेय और नंदी के छोटे मंदिर भी बने हुए हैं। पास ही असन नदी के किनारे स्नान के लिए घाट है, जहां श्रद्धालु पूजा से पहले स्नान करते हैं।
महाशिवरात्रि व श्रावण मास में टपकेश्वर महादेव मंदिर में भारी भीड़ उमड़ती है। इन दिनों यहां मेले जैसा माहौल रहता है। दूर-दराज से आए श्रद्धालु जलाभिषेक करते हैं और भोलेनाथ के दर्शन करते हैं। स्थानीय जौनसारी समुदाय के लिए भी यह स्थल खास महत्व रखता है। उनके लिए यह साधना और आस्था का स्थान माना जाता है।
आज के समय में टपकेश्वर महादेव मंदिर देहरादून के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल है। शहर से इसकी दूरी ज्यादा नहीं है, जिस वजह से देश-विदेश से आने वाले पर्यटक भी यहां पहुंचते हैं। हर साल लाखों श्रद्धालु और सैलानी इस गुफा मंदिर के दर्शन करते हैं, जिससे आसपास के इलाकों में रोज़गार के अवसर भी बढ़े हैं।
तेजी से बढ़ते शहरीकरण और पर्यटकों की संख्या के चलते असन नदी और आसपास के क्षेत्र पर दबाव बढ़ा है। ट्रैफिक, कूड़ा और अतिक्रमण जैसी समस्याएं भी सामने आ रही हैं। ऐसे में इस धार्मिक स्थल को सहेज कर रखना एक बड़ी चुनौती है। सरकार और स्थानीय प्रशासन की ओर से संरक्षण के प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि आस्था के इस केंद्र की प्राकृतिक पहचान बनी रहे।






