योगेंद्र मलिक
देहरादून, 27 फरवरी 2026:
रंगों के त्योहार होली में अब महज एक सप्ताह का समय बचा है और देहरादून के बाजारों में चहल-पहल तेज हो गई है। शहर के झंडेवाला क्षेत्र में लगे मैदान में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ से आया जायसवाल परिवार पिछले करीब सत्तर वर्षों से पारंपरिक तरीके से हर्बल गुलाल तैयार कर रहा है। यह गुलाल पूरी तरह ऑर्गेनिक बताया जाता है और इसे आरारोट तथा खाद्य रंगों से बनाया जाता है।
परिवार के सदस्यों के अनुसार इस काम की शुरुआत उनके दादाजी ने की थी। समय के साथ यह परंपरा आगे बढ़ती गई और अब तीसरी पीढ़ी इस कारोबार को संभाल रही है। हर साल शिवरात्रि के पांचवें दिन परिवार देहरादून पहुंचता है और मेले की समाप्ति तक यहीं रहकर होली के लिए गुलाल और ऑर्गेनिक सिंदूर तैयार करता है।

परिवार से जुड़े पवन जायसवाल बताते हैं कि उनके पिता छह दशक से अधिक समय से इस काम में लगे हुए हैं। पहले उत्पादन सीमित होता था, लेकिन अब लोगों में हर्बल रंगों के प्रति जागरूकता बढ़ने से मांग कई गुना बढ़ चुकी है।
गुलाल बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह पारंपरिक और मेहनत वाली है। शुद्ध आरारोट में खाने वाले रंग मिलाकर उसमें हल्का पानी डाला जाता है। इसके बाद मिश्रण को बारीकी से छाना जाता है। एक बोरी गुलाल छानने में तीन से चार घंटे लगते हैं। फिर इसे सुखाकर पैक किया जाता है। परिवार आठ अलग-अलग रंगों का गुलाल तैयार करता है, जिसे त्वचा के लिए सुरक्षित बताया जाता है।
व्यापारियों के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में भगवा रंग की मांग तेजी से बढ़ी है। पहले जहां पांच से छह बोरी गुलाल बनता था, अब मांग के अनुसार करीब बीस बोरी तक उत्पादन किया जा रहा है। परिवार का कहना है कि भगवा रंग का धार्मिक महत्व होने के कारण लोग इसे ज्यादा पसंद कर रहे हैं।






