लखनऊ, 22 मार्च 2026:
प्रदेश में खेती का तरीका तेजी से बदल रहा है। अब किसान सिर्फ पारंपरिक फसलों पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि नई तकनीक और नई फसलों की तरफ भी कदम बढ़ा रहे हैं। बीते कुछ वर्षों में खेती में हुए बदलाव ने किसानों की आमदनी बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। सरकार की तरफ से तकनीक को बढ़ावा देने और लागत कम करने के प्रयासों का असर अब जमीन पर साफ दिखाई देने लगा है।
खेतीं में शुरू हुआ ड्रोन का उपयोग
खेती में आधुनिक तकनीक को शामिल करने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल शुरू किया गया है। ड्रोन के जरिए दवा का छिड़काव, फसल की निगरानी और खेतों का आकलन अब पहले से ज्यादा आसान हो गया है। इस तकनीक को बढ़ावा देने के लिए किसान उत्पादक संगठनों और कृषि से जुड़े युवाओं को ड्रोन खरीदने पर 40 से 50 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जा रही है। इससे गांवों में तकनीक की पहुंच बढ़ी है और खेती का काम तेज हुआ है।

समय की बचत हुई व मजदूरी के खर्च का बोझ हटा
ड्रोन के इस्तेमाल से किसानों को सबसे बड़ा फायदा समय की बचत के रूप में मिल रहा है। पहले जहां एक खेत में दवा छिड़कने में घंटों लग जाते थे, वहीं अब वही काम कुछ ही मिनटों में पूरा हो जाता है। इससे मजदूरी का खर्च कम हुआ है और दवा का सही मात्रा में इस्तेमाल हो रहा है। इसका सीधा असर फसल की गुणवत्ता पर भी पड़ा है।
मक्का विकास में किसानों को बीज में मिली छूट
तकनीक के साथ-साथ फसलों में विविधता लाने पर भी जोर दिया जा रहा है। इसी दिशा में मक्का विकास कार्यक्रम किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है। इस योजना के तहत किसानों को बीज पर भारी छूट दी जा रही है, जिससे उनकी लागत कम हो रही है और वे नई फसलें अपनाने के लिए आगे आ रहे हैं।
किसानों को महसूस हुआ बदलाव
गोरखपुर के ब्रह्मपुर ब्लॉक में इस बदलाव की झलक साफ दिखाई देती है। यहां के किसानों ने पहली बार बड़े पैमाने पर स्वीट कॉर्न की खेती की और इससे उन्हें बेहतर मुनाफा मिला। पहले ये किसान धान और सामान्य मक्का की खेती करते थे, लेकिन अब उन्होंने नई फसल की तरफ रुख किया है। इस बदलाव में किसान उत्पादक संगठन की भूमिका अहम रही। संगठन से जुड़े किसानों ने मिलकर क्लस्टर के रूप में खेती की, जिससे उन्हें तकनीकी मदद और बाजार तक पहुंच दोनों मिली। कुल आठ एकड़ जमीन पर स्वीट कॉर्न की खेती की गई, जिसमें कई किसानों ने भाग लिया।
छोटे व सीमांत किसान भी जुड़े
शुरुआत में किसानों को इस नई फसल को लेकर थोड़ी आशंका थी, लेकिन बीज पर 90 प्रतिशत अनुदान मिलने से उनका भरोसा बढ़ा। प्रति एकड़ लागत आठ से दस हजार रुपये के बीच रही, जो पारंपरिक खेती की तुलना में काफी कम है। इससे छोटे और सीमांत किसानों के लिए भी यह खेती संभव हो पाई।
कृषि विभाग ने लगातार संपर्क बनाए रखा
खेती के दौरान कृषि विभाग की टीम लगातार किसानों के संपर्क में रही। उन्हें समय-समय पर फसल की देखभाल, सिंचाई और रोग नियंत्रण की जानकारी दी गई। इससे फसल की गुणवत्ता बेहतर रही और उत्पादन उम्मीद से ज्यादा मिला। स्वीट कॉर्न की फसल करीब ढाई महीने में तैयार हो गई। इससे किसानों को एक साल में ज्यादा फसल लेने का मौका मिला। प्रति एकड़ औसतन 40 क्विंटल उत्पादन हुआ, जो किसानों के लिए काफी संतोषजनक रहा।
जोखिम लेने की हिचक को किसान ने छोड़ा
बाजार में इस फसल की अच्छी मांग मिली। स्थानीय स्तर पर ही तैयार फसल को करीब 30 रुपये प्रति किलो के भाव से बेचा गया। इससे किसानों की आमदनी में बड़ा इजाफा हुआ। एक एकड़ से एक से सवा लाख रुपये तक की कमाई हुई, जो धान जैसी पारंपरिक फसल की तुलना में कहीं ज्यादा है। इस सफलता के बाद किसानों का आत्मविश्वास बढ़ा है। अब वे नई तकनीक और नई फसलों को अपनाने के लिए तैयार हैं। इससे गांवों में खेती को लेकर एक नया माहौल बन रहा है और किसान जोखिम लेने से पीछे नहीं हट रहे हैं।
कृषि स्नातक युवाओं को मिला अवसर
ड्रोन तकनीक ने खेती में युवाओं की भागीदारी भी बढ़ाई है। कृषि स्नातक अब गांवों में ड्रोन सेवा उपलब्ध करा रहे हैं। इससे उन्हें रोजगार मिला है और किसानों को भी सुविधा मिल रही है। यह मॉडल आने वाले समय में और मजबूत हो सकता है। समूह में खेती करने से किसानों को बाजार में बेहतर दाम मिल रहे हैं। पहले जहां किसान अपनी उपज को छोटे स्तर पर बेचते थे, वहीं अब वे संगठित होकर बड़े खरीदारों तक पहुंच बना रहे हैं। इससे उनकी सौदेबाजी की ताकत भी बढ़ी है।
भविष्य में स्वीट कार्न की खेती का दायरा बढ़ेगा
स्वीट कॉर्न जैसी फसलें अब किसानों के लिए आकर्षण का केंद्र बनती जा रही हैं। इसकी वजह है कम समय में तैयार होना और बाजार में इसकी लगातार मांग बने रहना। इसके अलावा इस फसल को शहरों में भी आसानी से बेचा जा सकता है, जिससे किसानों को ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ता। ब्रह्मपुर ब्लॉक के किसानों का अनुभव अब आसपास के इलाकों में भी चर्चा का विषय बन गया है। दूसरे गांवों के किसान भी इस खेती के बारे में जानकारी ले रहे हैं और इसे अपनाने की योजना बना रहे हैं। इससे आने वाले समय में इस फसल का दायरा और बढ़ सकता है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिली मजबूती
खेती में इस तरह के बदलाव से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल रही है। किसानों की आमदनी बढ़ने से उनके जीवन स्तर में सुधार हो रहा है और गांवों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे कई उदाहरण सामने आ रहे हैं, जहां किसान नई तकनीक और नई फसलों के जरिए बेहतर कमाई कर रहे हैं। इससे यह साफ हो गया है कि सही मार्गदर्शन और सहयोग मिलने पर खेती को लाभकारी बनाया जा सकता है।
बाजार की मांग के अनुरूप किसान ले रहे निर्णय
अब किसान सिर्फ उत्पादन बढ़ाने पर ही ध्यान नहीं दे रहे, बल्कि बाजार की मांग को समझकर फसल का चुनाव कर रहे हैं। इससे उन्हें बेहतर दाम मिल रहे हैं और नुकसान की संभावना भी कम हो रही है। तकनीक, सहयोग और सही योजना के मेल से खेती का स्वरूप बदल रहा है। इससे किसानों का भरोसा बढ़ा है और वे नए प्रयोग करने के लिए तैयार हैं। आने वाले समय में यह बदलाव और तेजी से आगे बढ़ सकता है।
खेती के प्रति नई पीढ़ी का रुझान बढ़ा
गांवों में अब खेती को सिर्फ मेहनत का काम नहीं, बल्कि समझदारी और योजना का काम माना जाने लगा है। नई पीढ़ी भी खेती की ओर आकर्षित हो रही है, जो पहले शहरों की ओर रुख कर रही थी। खेती में हो रहे इन बदलावों से यह साफ है कि अगर किसानों को सही समय पर मदद और जानकारी मिले तो वे किसी भी नई चुनौती को अवसर में बदल सकते हैं। यही वजह है कि अब खेतों में सिर्फ फसल नहीं, बल्कि नए प्रयोग और नई सोच भी उग रही है।






