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कारगिल में दी थी अमरेंद्र ने शहादत…सरकार भूल गई स्मृतियां संजोना, परिवार ने बनाया समाधि स्थल, करता है श्रद्धांजलि सभा

22 मार्च 2002 को कारगिल युद्ध में शहीद हुए जवान की कहानी आज उपेक्षा के बावजूद यादों में है जिंदा, परिवार को है सरकारी उपेक्षा का मलाल पिता व भाई गांव में हर साल करते हैं श्रद्धांजलि सभा

एमएम खान

मोहनलालगंज (लखनऊ), 22 मार्च 2026:

निगोहां गांव में अमरेंद्र बहादुर सिंह की स्मृति में हर साल 22 मार्च को श्रद्धांजलि सभा का आयोजन होता है। इस आयोजन में मुख्य रूप से परिवार और ग्रामीण हिस्सा लेते हैं। खास बात ये है कि कारगिल युद्ध मे शहीद हुए इस सैनिक की स्मृति संजोने के लिए सरकार ने एक ईंट तक नहीं रखी। परिवार ने ही गेट बनाया समाधि स्थल का निर्माण कराया और खुद ही श्रद्धांजलि सभा का आयोजन भी करता है।

बहादुरी की मिसाल है अमरेंद्र ‘टाइगर’ का जीवन

द हो हल्ला ने निगोहां पहुंचकर शहीद के परिवार से मुलाकात की। परिवार द्वारा बनाया गया गेट व समाधि स्थल देखा और परिजनों से ही उनकी दास्तान सुनी। पिता जंगबहादुर सिंह और भाई रणविजय सिंह बताते हैं कि सरकार और संबंधित विभागों की ओर से अब तक कोई मदद नहीं मिली। इस बार भी आयोजन स्थानीय स्तर पर ही सीमित रहेगा। पिता ने बताया कि अमरेंद्र बहादुर सिंह, जिन्हें गांव में टाइगर के नाम से बुलाया जाता था। उन्होंने हमेशा न्याय की लड़ाई लड़ी और गलत करने वालों को सबक सिखाया। खेलकूद में भी वह अव्वल थे और किसी भी तरह की हिंसा या अन्याय सहन नहीं करते थे। अमरेंद्र बचपन से ही सेना में जाने के इच्छुक थे। जब उन्हें पुलिस भर्ती के लिए बुलाया गया, तो उन्होंने देश सेवा के लिए नौकरी ठुकरा दी। उनके पिता बताते हैं कि शुरुआत में वह नाराज थे लेकिन अब अपने बेटे पर गर्व करते हैं।

बेटियों ने पिता को नहीं देखा लेकिन उनके किस्से खूब सुने

22 मार्च 2002 को कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए। बचपन से ही साहसी और दूसरों की मदद करने वाले अमरेंद्र ने कई बार अपने साथी और पड़ोसियों की जान बचाई। स्कूल और कॉलेज में भी खेलकूद और सामाजिक मामलों में वह हमेशा अव्वल रहते थे। शहीद की पत्नी सोनिया का निधन 2004 में हो गया। अमरेंद्र की दो बेटियां हैं, बड़ी अनुपमा सिंह का हाल ही में विवाह हुआ और छोटी प्रिया सिंह नौकरी की तैयारी कर रही हैं। प्रिया ने इंटरमीडिएट में 93 प्रतिशत अंक प्राप्त कर गांव का नाम रोशन किया। प्रिया बताती हैं कि उन्होंने अपने पिता को कभी नहीं देखा लेकिन उनके बहादुरी के किस्से सुनकर गर्व होता है। वह भी देश सेवा में अपने पिता की तरह योगदान देना चाहती हैं।

Kargil Martyr Amarendra A Family's Tribute (1)

पिता ने बनवाया समाधि स्थल , बेटियों की परवरिश की जिम्मेदारी संभाली

शहीद अमरेंद्र की समाधि स्थल का निर्माण उनके पिता ने अपनी ओर से कराया। जंगबहादुर सिंह और परिवार ने कई बार प्रतिमा और मार्ग पर गेट बनाने की मांग की, लेकिन प्रशासन और सरकार ने कोई सुनवाई नहीं की। परिवार का कहना है कि अगर शहीद के नाम से गेट और स्मृति स्थल बनते तो गर्व की बात होती। शहीद अमरेंद्र की बेटियों की परवरिश उनके पिता जंगबहादुर सिंह और दादी कर रही हैं। परिवार का कहना है कि अगर उनके अलावा कोई मदद नहीं होती तो बेटियों की परवरिश मुश्किल होती। आर्मी विभाग से कोई आर्थिक या सामाजिक मदद नहीं मिली।

बेटी की शादी में नहीं पहुंचे आफिसर्स

बड़ी बेटी अनुपमा की शादी अक्टूबर में हुई। शादी में आर्मी के ऑफिसर्स और विभाग के लोग आमंत्रित थे, लेकिन कोई उपस्थित नहीं हुआ। परिवार के अनुसार, विभाग की गैरमौजूदगी ने उम्मीदों को तोड़ दिया। पूर्व ग्राम प्रधान सुरेंद्र दीक्षित ने शहीद अमरेंद्र के नाम पर हाईवे मार्ग और गेट बनाने की मांग की, लेकिन प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की। परिवार ने कहा कि समाज और प्रशासन की उदासीनता के बावजूद वे अपने बेटे की स्मृति को जीवित रखेंगे।

आज फिर होगी श्रद्धांजलि सभा

अमरेंद्र बहादुर सिंह की बहादुरी और साहस की कहानियां आज भी इलाके के बच्चों और युवाओं को प्रेरित करती हैं। बचपन से ही दूसरों की मदद करना, साहसिक कारनामे करना और देश के लिए समर्पित होना उनके व्यक्तित्व का हिस्सा था। इस वर्ष एक बार फिर से 22 मार्च, रविवार को निगोहां स्थित शहीद स्मारक पर दोपहर 3 बजे श्रद्धांजलि सभा होगी। आसपास के लोग शहीद को याद करेंगे। इस अवसर पर फूल चढ़ाने, सफाई और श्रद्धांजलि देने का काम भी किया जाएगा।

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