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‘चरक’ Review…दर्शकों को बांधे रखती है आस्था व अंधविश्वास के बीच उलझी कहानी

संवेदनशील मुद्दे को उठाती है फिल्म में गांव, समस्याओं के समाधान की खोज में अंधविश्वास का सहारा लेने की दिखती है जद्दोजहद

एंटरटेनमेंट डेस्क, 6 मार्च

अंधविश्वास जैसे संवेदनशील विषय पर बनी फिल्म ‘चरक: फेयर ऑफ फेथ’ शुक्रवार को सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। यह फिल्म ग्रामीण समाज में फैली मान्यताओं और उनके असर को दिखाने की कोशिश करती है। करीब दो घंटे की यह कहानी दर्शकों को अंत तक यह सोचने पर मजबूर करती है कि आस्था और अंधविश्वास के बीच की सीमा कहां खत्म होती है।

फिल्म का निर्देशन शिलादित्य मौलिक ने किया है। उन्होंने कहानी को ग्रामीण माहौल के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश की है। फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर करते हैं कि आस्था और डर के बीच लोग कैसे फैसले लेने लगते हैं। निर्देशक यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि जब लोग लंबे समय तक समस्या का समाधान नहीं खोज पाते, तो कई बार अंधविश्वास की ओर झुक जाते हैं।

फिल्म के कलाकारों ने अपने किरदारों को सादगी के साथ निभाया है। साहिदुर रहमान ने पुलिस अधिकारी सुभाष की भूमिका में संतुलित अभिनय किया है। अंजलि पाटिल सीमित समय के लिए पर्दे पर दिखाई देती हैं, लेकिन अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में सफल रहती हैं। संखदीप बनर्जी ने बिरसा के किरदार में सहज अभिनय किया है, जबकि सुब्रत दत्ता ने एक लापरवाह और शराबी पिता की भूमिका को प्रभावी ढंग से निभाया है। शशि भूषण ने ऐसे व्यक्ति का किरदार निभाया है जो संतान की इच्छा में मानसिक दबाव से गुजर रहा है।

फिल्म की कहानी एक ऐसे गांव के इर्द-गिर्द घूमती है जहां ‘चरक’ नाम का एक त्योहार मनाया जाता है। गांव के लोगों का विश्वास है कि इस पर्व के दौरान की गई पूजा से संतान की इच्छा पूरी हो सकती है। सुकुमार नाम का व्यक्ति कई साल से संतान की कामना करता है और हर साल चरक पर्व पर पूजा करता है, लेकिन उसकी इच्छा पूरी नहीं होती। दूसरी ओर पुलिस अधिकारी सुभाष और उनकी पत्नी शेफाली भी संतान न होने की परेशानी से गुजर रहे हैं। हालांकि सुभाष अंधविश्वास में भरोसा नहीं करता।

गांव में यह चर्चा भी फैलती है कि संतान प्राप्ति के लिए किसी बच्चे की बलि देनी पड़ती है। इसी बीच चरक पर्व से पहले गांव के दो बच्चे अचानक गायब हो जाते हैं। इसके बाद पूरे गांव में तरह-तरह की आशंकाएं पैदा हो जाती हैं। कहानी आगे बढ़ते हुए कई सवाल खड़े करती है। क्या बच्चों के गायब होने का संबंध इसी मान्यता से है, या इसके पीछे कोई और सच्चाई है। इन सवालों के जवाब फिल्म के अंत में सामने आते हैं। फिल्म का संगीत बिशाख ज्योति ने दिया है। कई दृश्यों में पृष्ठभूमि संगीत माहौल के अनुरूप लगता है। लोकेशन और सिनेमेटोग्राफी कहानी के वातावरण को बेहतर ढंग से सामने लाती है।

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