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GTRI ने क्यों जताई चिंता? सरकार के Export Mission की राह में ये बन सकते हैं रोड़े

थिंक टैंक GTRI ने सरकार की नई एक्सपोर्ट प्रमोशन पॉलिसी पर बड़ा सवाल उठाया है। संस्था का कहना है कि अगर गाइडलाइन, फंडिंग और समन्वय की कमी रही, तो 25,000 करोड़ की ये योजना शुरू होने से पहले ही लड़खड़ा सकती है।

लखनऊ, 13 नवंबर 2025 :

भारत सरकार ने हाल ही में देश के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए 25,060 करोड़ रुपये के एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन को मंजूरी दी है। इसका मकसद एमएसएमई सेक्टर, नए एक्सपोर्टर्स और लेबर-इंटेंसिव इंडस्ट्रीज़ की प्रतिस्पर्धा को बढ़ाना है। लेकिन थिंक टैंक GTRI (Global Trade Research Initiative) का कहना है कि इस मिशन की सफलता आसान नहीं होगी, क्योंकि इसे धरातल पर उतारने के लिए कई बड़ी चुनौतियां सामने हैं।

कम फंड और धीमी प्रक्रिया सबसे बड़ी चुनौती

GTRI की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने छह साल के लिए 25,060 करोड़ रुपये तय किए हैं, यानी हर साल लगभग 4,200 करोड़ रुपये से भी कम। जबकि सिर्फ पिछले साल ब्याज समकारी योजना (Interest Equalisation Scheme) पर ही 3,500 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हुए थे। ऐसे में ब्रांडिंग, पैकेजिंग, ट्रेड फेयर, लॉजिस्टिक्स और कंप्लायंस जैसी जरूरी चीजों के लिए बहुत कम फंड बचता है। इससे मिशन की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।

पुराने कार्यक्रमों में अटकी भुगतान प्रक्रिया

रिपोर्ट में कहा गया है कि 2025-26 के आठ महीने पहले ही बीत चुके हैं, लेकिन पुराने स्कीम्स जैसे MAI (Market Access Initiative) और IES (Interest Equalisation Scheme) के तहत अभी तक भुगतान नहीं हुआ है। इससे निर्यातकों को मुश्किल दौर में किसी तरह का आर्थिक सहारा नहीं मिल पा रहा है।

समन्वय और दिशानिर्देश होंगे सफलता की चाबी

GTRI के फाउंडर अजय श्रीवास्तव ने कहा कि यह मिशन स्वागत योग्य कदम है, लेकिन इसे सफल बनाने के लिए स्पष्ट गाइडलाइंस, पर्याप्त फंडिंग और मजबूत इंटर-मिनिस्ट्री कोऑर्डिनेशन जरूरी है। अगर मंत्रालयों के बीच तालमेल नहीं बैठा तो मिशन का असर सीमित रह जाएगा।

ऑनलाइन सिस्टम से मिलेगी पारदर्शिता

GTRI ने सुझाव दिया कि मिशन के तहत एक नई ऑनलाइन प्रणाली तैयार की जानी चाहिए, जिससे आवेदन और फंड वितरण की प्रक्रिया तेज और पारदर्शी हो सके। साथ ही, पात्रता, प्रक्रिया और फंड रिलीज़ से जुड़ी जानकारी जल्द से जल्द जारी की जानी चाहिए।

अब अगला कदम सरकार के हाथ में

विशेषज्ञों का मानना है कि मिशन की दिशा सही है, लेकिन अगर इसे मजबूत नीति, समय पर फंडिंग और स्पष्ट नियमों के साथ नहीं लागू किया गया, तो इसका असर सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएगा। अब देखना होगा कि केंद्र सरकार इन चुनौतियों से कैसे निपटती है ताकि भारत का निर्यात वैश्विक स्तर पर नई ऊंचाइयों तक पहुंच सके।

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