Lucknow City

लखनऊ विश्वविद्यालय में ‘लॉ एंड ऑर्डर’ के नाम पर सम्मेलन पर ब्रेक, गेट नंबर-1 बना प्रतिरोध का मंच

आयोजन की लिखित अनुमति के बावजूद आइसा का यूनिट सम्मेलन रोके जाने का आरोप, छात्रों का दिखा गुस्सा, खुले सत्र में बदला विरोध प्रदर्शन

लखनऊ, 25 अप्रैल 2026:

लखनऊ विश्वविद्यालय एक बार फिर छात्र राजनीति और प्रशासनिक फैसलों को लेकर विवादों के केंद्र में आ गया है। लोक प्रशासन विभाग में शनिवार को आयोजित होने वाले आइसा के 9वें यूनिट सम्मेलन पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने अंतिम समय में रोक लगा दी जबकि इसके लिए संगठन को पहले लिखित अनुमति दिए जाने की बात कही गई। प्रशासन ने सम्मेलन में शामिल होने वाले बाहरी छात्र नेताओं की मौजूदगी को ‘लॉ एंड ऑर्डर’ का मुद्दा बताते हुए यह कदम उठाया।

इस सम्मेलन में आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा और जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष धनंजय को संबोधित करना था। कार्यक्रम पर रोक लगने के बाद आइसा ने गेट नंबर-एक पर खुला सत्र आयोजित किया जो एक बड़े विरोध प्रदर्शन में तब्दील हो गया। बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं और कार्यकर्ता मौके पर जुटे और प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।

खुले सत्र को संबोधित करते हुए धनंजय ने विश्वविद्यालय प्रशासन के फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि जब छात्र नेताओं को ‘लॉ एंड ऑर्डर’ के लिए खतरा बताया जाने लगे तो यह केवल प्रशासनिक अतिरेक नहीं बल्कि राजनीतिक हस्तक्षेप का संकेत है। उनके मुताबिक विश्वविद्यालयों को ऐसे स्थानों में बदला जा रहा है जहां सवाल उठाना अपराध और चुप्पी को आदर्श बनाया जा रहा है।

Lucknow University Halts 'Law & Order' Seminar Plans (1)

वहीं, आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और यूजीसी के नए नियमों को निशाने पर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि ये नीतियां निष्पक्ष सुधार के बजाय विश्वविद्यालयों पर नियंत्रण बढ़ाने, असहमति को दबाने और छात्र राजनीति को कमजोर करने की दिशा में काम कर रही हैं। उनके अनुसार सम्मेलन पर रोक इसी व्यापक नीति ढांचे का हिस्सा है।

आइसा के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष मनीष कुमार ने भी प्रशासन पर राजनीतिक दबाव में काम करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि ‘लॉ एंड ऑर्डर’ का तर्क चयनात्मक रूप से इस्तेमाल किया जा रहा है। दक्षिणपंथी संगठनों पर प्रशासन खामोश रहता है जबकि प्रगतिशील छात्र संगठनों पर तुरंत कार्रवाई होती है।

छात्रों ने इस फैसले को लोकतांत्रिक स्पेस पर हमला बताते हुए एकजुट प्रतिरोध का ऐलान किया। आइसा का कहना है कि यह केवल एक सम्मेलन को रोकने का मामला नहीं बल्कि उच्च शिक्षा में बढ़ते केंद्रीकरण और संस्थागत स्वायत्तता के क्षरण की बड़ी तस्वीर का हिस्सा है। विवाद और विरोध के बीच आइसा की संविधा ने साफ किया कि उसका संगठनात्मक सत्र अब 26 अप्रैल को आयोजित किया जाएगा।

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