वाराणसी, 28 फरवरी 2026:
काशी के मणिकर्णिका घाट पर शनिवार को मसान की होली का अनोखा नजारा देखने को मिला। चिता भस्म, रंग-गुलाल और डमरू की थाप के साथ साधु-संन्यासियों ने परंपरागत रीति से उत्सव की शुरुआत की। सुबह से ही बाबा मसान नाथ के मंदिर में पूजा-पाठ का सिलसिला शुरू हो गया। नागा साधुओं सहित कई अखाड़ों के संत जुटे और पहली चिता-राख अर्पित कर भस्म-होली का आगाज किया।
घाट तक पहुंचने के रास्तों पर प्रशासनिक पाबंदियां रहीं। पुलिस ने गलियों को आम आवागमन के लिए बंद रखा और केवल शव यात्राओं को ही अनुमति दी गई। बावजूद इसके वैकल्पिक मार्गों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु घाट तक पहुंचे। हर मोड़ पर पुलिसकर्मी मुस्तैद रहे लेकिन घाट पर उत्सव और शवयात्राओं का विचित्र संगम दिनभर बना रहा। एक ओर डमरू की गूंज और साधुओं का नृत्य, तो दूसरी ओर अंतिम संस्कार की गंभीरता।

डमरू वादन के साथ साधु-संन्यासी नरमुंडों की माला धारण किए घाट पर पहुंचे। पूजन के बाद भस्म, रंग, गुलाल और अबीर बाबा को अर्पित किए गए और फिर चिता भस्म की होली खेली गई। जिस राख से आमतौर पर लोग दूरी बनाते हैं उसी में आज श्रद्धालु श्रद्धा और आस्था के रंग में सराबोर दिखे। विदेशी पर्यटक भी इस अनूठे उत्सव को देखकर मंत्रमुग्ध नजर आए और ढोल-डमरू की लय पर झूमते दिखे।
भीड़ का आलम यह रहा कि गलियों में कदम रखना मुश्किल हो गया। प्रशासनिक आकलन के मुताबिक मसान की होली में हिस्सा लेने के लिए लाखों श्रद्धालु और पर्यटक काशी पहुंचे। विवाद और रोक की चर्चाओं के बीच काशी ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि यहां मृत्यु भी उत्सव बनकर जीवन का हिस्सा बन जाती है।






