
विजय पटेल
रायबरेली, 30 जुलाई 2026:
महराजगंज तहसील के ओई गांव में बारिश के बाद जमीन धंसने से सामने आई सुरंग अब पुरातत्व विशेषज्ञों के लिए जांच का विषय बन गई है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI की टीम ने मौके पर जांच की तो यहां मिले प्राचीन अवशेषों से कुषाण काल की सभ्यता के संकेत मिले हैं। हालांकि इसकी पक्की पुष्टि ASI की विस्तृत वैज्ञानिक रिपोर्ट आने के बाद ही होगी।
यह मामला उस समय सामने आया जब बीते शुक्रवार को किसान की निजी जमीन पर अचानक करीब एक मीटर चौड़ा गड्ढा बन गया। गड्ढे के अंदर पक्की ईंटों से बनी संरचना दिखाई दी। ग्रामीणों ने इसकी सूचना प्रशासन को दी। इसके बाद SDM महराजगंज चंद्र प्रकाश गौतम ने मौके पर पहुंचकर निरीक्षण किया और रिपोर्ट जिलाधिकारी सरनीत कौर ब्रोका को भेजी।
सुरंग में मिली 15 से 20 फीट लंबी संरचना
प्रशासन की सूचना पर ASI की टीम बुधवार को ओई गांव पहुंची। लखनऊ मंडल के सहायक पुरातत्वविद डॉ. मनोज कुमार पांडेय के नेतृत्व में टीम ने सुरंग के अंदर जाकर जांच की। टीम को उत्तर से दक्षिण दिशा में करीब 15 से 20 फीट लंबी ईंटों की संरचना मिली। जांच में सामने आया कि संरचना में इस्तेमाल ईंटों का आकार करीब 40×28×8 सेंटीमीटर है। ASI अधिकारियों के मुताबिक ईंटों का यह आकार और निर्माण शैली करीब दो हजार साल पुराने कुषाण काल से मेल खाती है। सुरंग के भीतर से प्राचीन ईंटों के अलावा मिट्टी की सुराही, एक हैंडल वाली धूपदानी समेत कई दूसरे पुरातात्विक अवशेष भी मिले हैं।

1985 से अवशेष सहेज रहे ग्रामीण
जांच के दौरान ASI टीम गांव निवासी अशोक प्रताप मौर्य के घर भी पहुंची। यहां उन्होंने वर्ष 1985 से सुरक्षित रखे गए प्राचीन अवशेषों को देखा। अशोक प्रताप मौर्य का कहना है कि ओई भीट पहले से ही पुरातत्व विभाग के रिकॉर्ड में एक ऐतिहासिक स्थल के तौर पर दर्ज है। उनके पास सुरक्षित मृदापात्र, ढेबर, थपकी, प्रस्तर समेत कई पुराने अवशेष भी टीम ने देखे। शुरुआती जांच में इन अवशेषों को भी कुषाण काल की संस्कृति से जोड़ा जा रहा है। इन सभी वस्तुओं की वास्तविक उम्र और ऐतिहासिक महत्व की पुष्टि आगे की जांच के बाद होगी।
पूरे इलाके में आवाजाही पर रोक
सुरंग की सुरक्षा को देखते हुए प्रशासन ने इसके आसपास का इलाका अगले आदेश तक सील कर दिया है। मौके पर पुलिस बल तैनात किया गया है। ग्रामीणों और दूसरे लोगों के सुरंग के आसपास जाने पर रोक लगा दी गई है। प्रशासन का फोकस फिलहाल सुरंग और वहां मिले अवशेषों को सुरक्षित रखने पर है, जिससे जांच के दौरान किसी तरह की छेड़छाड़ न हो सके। ASI की टीम अपनी जांच से जुड़ी रिपोर्ट निदेशालय को भेजेगी।
अनुमति मिली तो हो सकती है वैज्ञानिक खोदाई
पुरातत्व विभाग की जांच में अगर स्थल का महत्व आगे भी कायम रहता है तो शासन से अनुमति मिलने के बाद यहां वैज्ञानिक उत्खनन कराया जा सकता है। इससे सुरंग की वास्तविक उम्र, इसके इस्तेमाल की वजह और जमीन के नीचे मौजूद दूसरी पुरानी संरचनाओं के बारे में जानकारी मिल सकती है। फिलहाल ASI की विस्तृत रिपोर्ट का इंतजार है। रिपोर्ट आने के बाद ही साफ होगा कि ओई गांव की सुरंग का संबंध कुषाण काल से कितना पुराना है और इसके नीचे किसी बड़ी प्राचीन बस्ती या दूसरी संरचना के अवशेष मौजूद हैं या नहीं।

क्या है कुषाण काल
कुषाण काल भारत के प्राचीन इतिहास का एक अहम दौर माना जाता है। आम तौर पर इसे पहली से तीसरी शताब्दी ईस्वी के बीच का समय माना जाता है। इस दौर में कुषाण शासकों का प्रभाव उत्तर भारत के बड़े हिस्से में रहा। यह साम्राज्य मध्य एशिया से लेकर उत्तर भारत और गंगा घाटी तक फैला हुआ था। मथुरा समेत कई इलाकों में इस समय कला, मूर्तिकला, व्यापार और निर्माण से जुड़ी गतिविधियां बढ़ीं। इसी दौर की कई पुरानी ईंटों, मूर्तियों, सिक्कों और दूसरे अवशेषों से उस समय की बस्तियों और जीवन के बारे में जानकारी मिलती है।






