
लखनऊ, 7 अगस्त 2026:
राष्ट्रीय लोकदल (RLD) को उत्तर प्रदेश में बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रामाशीष राय ने अपने पद के साथ पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत सिंह को भेजे पत्र में सिर्फ संगठन छोड़ने की जानकारी नहीं दी, बल्कि मौजूदा राजनीति, लोकतंत्र, धनबल, परिवारवाद, किसानों, युवाओं और सामाजिक माहौल को लेकर भी कई गंभीर सवाल उठाए हैं।
जिम्मेदारी के लिए जताया आभार
इस्तीफे में रामाशीष राय ने लिखा कि उन्हें उत्तर प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपने के लिए वह पार्टी नेतृत्व के आभारी हैं। उन्होंने कहा कि अपने कार्यकाल में उन्होंने प्रदेश के अलग अलग जिलों का दौरा किया, कार्यकर्ताओं से लगातार संवाद बनाया, संगठन को मजबूत करने की कोशिश की और पार्टी के विस्तार के लिए अपनी क्षमता के मुताबिक काम किया।
जेपी आंदोलन का किया जिक्र
रामाशीष राय ने अपने राजनीतिक सफर को लोकनायक जयप्रकाश नारायण के 1974-75 के संपूर्ण क्रांति आंदोलन से जोड़ते हुए कहा कि वह उसी विचारधारा से प्रेरित होकर राजनीति में आए थे। उनके मुताबिक उस दौर में भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी, लोकतांत्रिक संस्थाओं की गिरती स्थिति जैसे मुद्दे राष्ट्रीय चिंता का विषय थे। उन्होंने कहा कि व्यवस्था परिवर्तन का जो सपना तब दिखाया गया था, वह आज भी अधूरा नजर आता है।
लोकतंत्र, धनबल और परिवारवाद पर सवाल
अपने पत्र में राय ने लिखा कि भारतीय लोकतंत्र धीरे धीरे धनबल और प्रभावशाली वर्गों के नियंत्रण में सिमटता दिख रहा है। उनका कहना है कि राजनीति में वैचारिक प्रतिबद्धता कमजोर हुई है, जबकि आर्थिक ताकत और परिवारवाद का असर लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंता का विषय बताया।

किसान, युवा और सामाजिक माहौल का भी जिक्र
इस्तीफे में उन्होंने कहा कि किसान आज भी अपनी फसल का उचित दाम पाने के लिए संघर्ष कर रहा है। वहीं युवा बेरोजगारी और भविष्य की अनिश्चितता से जूझ रहा है। शिक्षा, रोजगार और सामाजिक न्याय के मोर्चे पर बढ़ती निराशा समाज में असंतोष पैदा कर रही है। उन्होंने यह भी लिखा कि समाज को जाति, उपजाति और संप्रदाय के आधार पर बांटने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जो सामाजिक सद्भाव के लिए ठीक नहीं है।

अटल वाजपेयी के बयान का भी दिया हवाला
रामाशीष राय ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का उल्लेख करते हुए लिखा कि उन्होंने भी चुनाव और राजनीति में बढ़ते धनबल को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया था। राय के मुताबिक आज वह आशंका काफी हद तक सही साबित होती दिखाई दे रही है। पत्र के आखिर में उन्होंने लिखा कि संविधान, लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार प्रहार हो रहे हैं। उन्होंने व्यक्ति से बड़ा दल और दल से बड़ा देश बताते हुए इन्हीं वैचारिक और नैतिक कारणों का हवाला दिया।






