
लखनऊ, 7 जुलाई 2026:
भारतीय संस्कृति, संगीत, लोक परंपराओं और प्रदर्शन कलाओं को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में यूपी सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। राजधानी लखनऊ के काकराबाद में प्रस्तावित भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय के नए परिसर को संगीत शिक्षा तक सीमित न रखकर देश के पहले समग्र ‘संस्कृति विश्वविद्यालय’ के रूप में विकसित करने की तैयारी शुरू हो गई है। लक्ष्य है कि यह परिसर अगले सौ वर्षों तक भारतीय सांस्कृतिक विरासत, भारतीय ज्ञान परंपरा और प्रदर्शन कलाओं का विश्वस्तरीय केंद्र बने।
इसी उद्देश्य से प्रदेश के संस्कृति, पर्यटन एवं धर्मार्थ कार्य विभाग के अपर मुख्य सचिव अमृत अभिजात की अध्यक्षता में आयोजित उच्चस्तरीय सलाहकार समिति की बैठक में देश के प्रतिष्ठित कलाकारों, शिक्षाविदों और विशेषज्ञों ने विश्वविद्यालय की भावी रूपरेखा पर व्यापक मंथन किया। बैठक में इस बात पर सहमति बनी कि भारत की हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक विरासत को एक ही मंच पर समेटने वाला यह संस्थान शास्त्रीय संगीत, नृत्य, रंगमंच, लोक एवं जनजातीय कलाओं, दृश्य एवं ललित कलाओं, साहित्य, दर्शन, योग, अध्यात्म और भारतीय ज्ञान प्रणाली का समग्र केंद्र बने।
विशेषज्ञों ने दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण, मौखिक परंपराओं के दस्तावेजीकरण, डिजिटल रिपॉजिटरी तथा भारतीय प्रदर्शन कलाओं के विश्वस्तरीय संग्रहालय की स्थापना का सुझाव दिया। इसके साथ ही संगीत, नृत्य, रंगमंच, योग एवं अध्यात्म, दृश्य एवं ललित कला, साहित्य एवं दर्शन, फिल्म निर्माण तथा कला एवं सांस्कृतिक प्रबंधन जैसे विषयों के अलग-अलग विशेष विद्यालय स्थापित करने की भी सिफारिश की गई।
बैठक में प्रस्तावित परिसर के लिए आधुनिक अधोसंरचना पर भी विस्तार से चर्चा हुई। इसमें ध्वनि-विज्ञान आधारित अभ्यास कक्ष, अत्याधुनिक नृत्य स्टूडियो, संगीत एवं रिकॉर्डिंग स्टूडियो, एआई म्युजिक लैब, विष्णु नारायण भातखंडे ग्रैंड ऑडिटोरियम, ब्लैक बॉक्स थिएटर, शास्त्रीय नृत्य थिएटर, रेसाइटल हॉल और मुक्ताकाशी मंच जैसी सुविधाओं के विकास पर सहमति बनी। इसके अलावा सांस्कृतिक स्टार्टअप्स के लिए इनक्यूबेशन सेंटर, मीडिया एवं कंटेंट लैब तथा बौद्धिक संपदा (आईपी) सहायता केंद्र स्थापित कर रचनात्मक अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा देने की योजना बनाई गई।

लोकगायिका मालिनी अवस्थी ने परिसर को भारतीय परंपरा और प्रकृति के अनुरूप विकसित करने पर बल देते हुए खुले वातावरण, शिक्षकों के लिए आवासीय व्यवस्था, उत्तर भारतीय और कर्नाटक संगीत के समन्वय, उत्तर प्रदेश के पारंपरिक घरानों को विश्वविद्यालय से जोड़ने, थिएटर कॉम्प्लेक्स, एग्जीबिशन हॉल और इंटरएक्टिव लर्निंग स्पेस विकसित करने का सुझाव दिया।
प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने विश्वविद्यालय को संगीत संस्थान के साथ समग्र संस्कृति विश्वविद्यालय बनाने की आवश्यकता बताई। वहीं पद्मश्री प्रो. वामन केंद्रे समेत अन्य विशेषज्ञों ने लोक एवं जनजातीय कलाओं, थिएटर, परफॉर्मिंग आर्ट्स, विजुअल आर्ट्स और साहित्य को एकीकृत पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने, डिजिटल आर्ट सेंटर स्थापित करने तथा देश-विदेश के नामी कलाकारों को नियमित रूप से आमंत्रित कर इसे अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संवाद का केंद्र बनाने पर जोर दिया।
अपर मुख्य सचिव अमृत अभिजात ने कहा कि उत्तर प्रदेश के पास ऐसा विश्वस्तरीय संस्थान विकसित करने का ऐतिहासिक अवसर है जो भारतीय संस्कृति की प्राचीन विरासत को संरक्षित करने के साथ नई पीढ़ी की आवश्यकताओं को भी पूरा करे। उन्होंने बताया कि परिसर के लिए राष्ट्रीय स्तर की आर्किटेक्चरल डिजाइन प्रतियोगिता आयोजित करने की योजना है जिससे देश के श्रेष्ठ वास्तु विशेषज्ञ इस महत्वाकांक्षी परियोजना में योगदान दे सकें।
उन्होंने डिजिटल आर्ट्स, एनीमेशन, डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माण, वर्चुअल प्रोडक्शन, म्यूजिक टेक्नोलॉजी, सांस्कृतिक कूटनीति और भारतीय ज्ञान परंपरा जैसे नए विषयों को भी पाठ्यक्रम में शामिल करने पर जोर दिया। विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. माण्डवी सिंह ने कहा कि नया परिसर परंपरा और आधुनिक तकनीक के समन्वय के साथ भारतीय संस्कृति, संगीत और प्रदर्शन कलाओं का विश्वस्तरीय केंद्र बनेगा। इसमें विद्यार्थियों को उत्कृष्ट शिक्षा, शोध और सृजन के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर का वातावरण उपलब्ध कराया जाएगा।






