
लखनऊ, 9 सितंबर 2026:
यूपी विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ प्रदेश की सियासत में जातिगत समीकरणों की नई बिसात बिछने लगी है। इसी बीच राजधानी लखनऊ में लगे कुछ होर्डिंग्स ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। इन होर्डिंग्स के जरिए कुर्मी समाज ने अब ‘हिस्सेदारी’ से आगे बढ़कर मुख्यमंत्री पद पर सीधी दावेदारी का संदेश दिया है।
कुर्मी मुख्यमंत्री अभियान समिति उत्तर प्रदेश की ओर से लगाए गए इन होर्डिंग्स में राजनीतिक दलों को संदेश दिया गया है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में जो दल कुर्मी समाज के नेता को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करेगा, उसके साथ समाज एकजुट होकर खड़ा होगा। अभियान समिति से जुड़े अभिषेक चौधरी, नवरत्न वर्मा और अन्य लोगों के नाम इस मुहिम से जोड़े जा रहे हैं।
समिति के अभिषेक चौधरी का कहना है कि कुर्मी समाज लंबे समय से उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है लेकिन प्रदेश के सर्वोच्च राजनीतिक पद पर उसे प्रतिनिधित्व नहीं मिला। अब 2027 के चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद के सवाल को राजनीतिक बहस के केंद्र में लाने की रणनीति बनाई जा रही है।
समिति ने राजनीतिक दलों के सामने सीधा सवाल भी रखा है कि 2027 में कुर्मी समाज को मुख्यमंत्री पद पर नेतृत्व देने के मुद्दे पर आपका रुख क्या है? समिति के लोगों का कहना है कि समाज अब केवल टिकट, चुनावी वादों और सत्ता में सीमित हिस्सेदारी तक खुद को सीमित नहीं रखना चाहता। मुख्यमंत्री पद और प्रदेश के राजनीतिक नेतृत्व को लेकर स्पष्ट राजनीतिक प्रतिबद्धता चाहिए।
लखनऊ में बड़ा सम्मेलन, नेताओं को बुलाने की तैयारी
होर्डिंग अभियान के बाद समिति अब लखनऊ में बड़े सामाजिक-राजनीतिक सम्मेलन की तैयारी का दावा कर रही है। इसमें कुर्मी समाज से जुड़े अलग-अलग राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, सांसदों, विधायकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को एक मंच पर लाने की योजना है। समिति की ओर से अनुप्रिया पटेल, पंकज चौधरी, कृष्णा पटेल, डॉ. आरएस पटेल समेत विभिन्न राजनीतिक-सामाजिक प्रतिनिधियों को आमंत्रित करने की बात कही जा रही है।

समिति का दावा है कि सम्मेलन किसी एक दल या व्यक्ति के समर्थन में शक्ति प्रदर्शन नहीं होगा अपितु 2027 की सामूहिक राजनीतिक रणनीति पर मंथन का मंच होगा। इसके साथ ही समाज के सांसदों और विधायकों से भी मुख्यमंत्री पद की मांग पर उनकी राय जानने की तैयारी है। समिति का सवाल है कि यदि चुनावों में समाज की राजनीतिक ताकत निर्णायक भूमिका निभाती है तो फिर नेतृत्व के सवाल पर उसकी आवाज क्यों न सुनी जाए?
लखनऊ से गांवों तक पहुंचेगा ‘CM’ अभियान
अभियान समिति के मुताबिक लखनऊ के होर्डिंग्स महज शुरुआत हैं। आगे प्रदेश के अलग-अलग जिलों में बैठकें, जनसंवाद और सामाजिक सम्मेलन आयोजित किए जाएंगे। समिति अपनी प्रचार सामग्री में उत्तर प्रदेश में कुर्मी समाज की आबादी 12-13 प्रतिशत बताती है। हालांकि, आधिकारिक जातिवार जनगणना उपलब्ध नहीं होने के कारण यह आंकड़ा समिति का अनुमान है।
यूपी की राजनीति में कुर्मी समाज को लंबे समय से प्रभावशाली पिछड़ा वर्ग माना जाता है। पूर्वी यूपी, अवध, बुंदेलखंड और रुहेलखंड के कई इलाकों में इसका राजनीतिक प्रभाव माना जाता है। ऐसे में 2027 से पहले ‘कुर्मी वोट बैंक’ को ‘कुर्मी नेतृत्व’ की मांग में बदलने की कोशिश बीजेपी, सपा और दूसरे दलों के लिए नई चुनौती बन सकती है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कोई प्रमुख दल चुनाव से पहले कुर्मी चेहरे को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने का जोखिम उठाएगा? एक तरफ ऐसा कदम कुर्मी वोटों को लामबंद कर सकता है तो दूसरी तरफ दूसरे पिछड़े वर्गों और अन्य सामाजिक समूहों के राजनीतिक समीकरण प्रभावित होने की आशंका भी रहेगी।






