Lucknow City

गड्ढे से मौत, डेटा चोरी से नुकसान या अस्पताल की लापरवाही- हर नागरिक को मिले नुकसान का हिसाब, New Compensation Law की मांग

सरोजनीनगर MLA डॉ. राजेश्वर सिंह ने केंद्रीय विधि मंत्री से की सिविल रॉन्ग्स पर कानून की मांग, ‘भारतीय सिविल रॉन्ग्स एवं क्षतिपूर्ति संहिता’ में तय होंगी जिम्मेदारी, दावा, समयसीमा और अंतरिम राहत, 1956 से अधूरी पड़ी कवायद को फिर गति देने की पहल

लखनऊ, 20 सितंबर 2026:

सड़क के गड्ढे में गिरने से जान चली जाए, अस्पताल की लापरवाही से मरीज को नुकसान हो, खराब भवन ढह जाए, साइबर ठगी में लाखों रुपये चले जाएं या किसी कंपनी के डेटा लीक से लोग प्रभावित हो… नुकसान झेलने वाले व्यक्ति को आखिर कितनी जल्दी और किस कानून के तहत मुआवजा मिले? इसी सवाल को लेकर लखनऊ के सरोजनीनगर क्षेत्र के भाजपा विधायक एवं पूर्व ईडी अफसर डॉ. राजेश्वर सिंह ने केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को पत्र लिखकर देश में व्यापक टॉर्ट कानून ‘भारतीय सिविल रॉन्ग्स एवं क्षतिपूर्ति संहिता’ लाने का आग्रह किया है।

डॉ. सिंह का तर्क है कि नए आपराधिक कानूनों BNS, BNSS और BSA के जरिए आपराधिक न्याय व्यवस्था में बड़ा बदलाव हो चुका है लेकिन नागरिकों को हुई क्षति की भरपाई से जुड़े कानूनों का ढांचा अभी भी बिखरा हुआ है। उनका कहना है कि केवल दोषी को सजा मिलना पर्याप्त नहीं है। जिस व्यक्ति को नुकसान हुआ है, उसे यथासंभव उसके पुराने जीवन की स्थिति में वापस लाना भी न्याय का हिस्सा होना चाहिए।

सात दशक पुरानी कमी पर सवाल

इस मांग के पीछे एक लंबा कानूनी इतिहास भी है। प्रथम विधि आयोग ने 1956 में ही राज्य की दायित्व-निर्धारण व्यवस्था पर कानून बनाने की सिफारिश की थी। 1965 और 1967 में विधेयक भी लाए गए लेकिन वे आगे नहीं बढ़ सके। प्रस्ताव के मुताबिक आज भी सिविल रॉन्ग्स के लिए भारत में कोई एक व्यापक कानून नहीं है और गलत तरीके से हुई मृत्यु से जुड़े दावे औपनिवेशिक दौर के Fatal Accidents Act, 1855 से जुड़े हुए हैं।

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मामले की जनहित अहमियत का अंदाजा सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़ों से लगाया जा सकता है। MoRTH के 2023 के आंकड़ों के अनुसार देश में 4,80,583 सड़क दुर्घटनाएं हुईं और 1,72,890 लोगों की मौत हुई, जबकि 4,62,825 लोग घायल हुए। डॉ. सिंह ने गड्ढों, खुले नालों और खराब डिजाइन जैसी लापरवाहियों में सड़क एजेंसियों और ठेकेदारों की जवाबदेही का सवाल उठाया है।

पांच सवालों का सीधा जवाब देगा कानून

प्रस्तावित संहिता में आम नागरिक के लिए पांच बुनियादी सवालों का स्पष्ट जवाब तय करने की बात है। किसके खिलाफ दावा करें, कहां करें, कितने समय में करें, कितनी क्षतिपूर्ति मांगें और फैसला आने तक अंतरिम राहत कैसे मिले। चिकित्सा लापरवाही, खराब सड़क-बिल्डिंग, औद्योगिक दुर्घटना, डीपफेक, डेटा ब्रीच और पुलिस ज्यादती जैसे मामलों को भी इसके दायरे में लाने का सुझाव है।

अफसरों और विभागों की भी तय हो जवाबदेही

प्रस्ताव में सरकारी विभागों के लिए दावों पर निर्धारित समयसीमा में जवाब देना अनिवार्य करने, ईमानदारी से लिए गए फैसलों पर अधिकारियों को संरक्षण देने और दुर्भावना या घोर लापरवाही साबित होने पर क्षतिपूर्ति की वसूली की व्यवस्था का सुझाव है। इसके साथ ही विभागों द्वारा सालाना दावों का डेटा सार्वजनिक करने की बात कही गई है जिससे बार-बार सामने आ रही प्रशासनिक खामियों की पहचान हो सके।

डॉ. सिंह ने झूठे दावों पर रोक, किफायती ऑनलाइन समाधान, मुकदमे से पहले मध्यस्थता और सद्भावना से लिए गए फैसलों की सुरक्षा जैसे प्रावधानों का भी सुझाव दिया है। उन्होंने मामले को विधि आयोग के पास भेजकर समयबद्ध रिपोर्ट, इसके बाद विशेषज्ञ समिति और राष्ट्रव्यापी परामर्श की प्रक्रिया शुरू करने का आग्रह किया है। उनका मानना है कि जहां नागरिक को नुकसान हुआ है वहां न्याय सिर्फ फैसला सुनाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। नुकसान की भरपाई और जीवन को यथासंभव दोबारा स्थापित करना भी न्याय का हिस्सा होना चाहिए।

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Rakesh Kumar Verma

राकेश कुमार वर्मा एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। इन्हें मीडिया जगत में लगभग 31 वर्षों का व्यापक और समृद्ध अनुभव है। इन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों ही माध्यमों में कार्य करते हुए अपनी मजबूत और प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई है। यूपी की राजधानी लखनऊ में स्वतंत्र भारत, राष्ट्रीय सहारा, जनसत्ता एक्सप्रेस,… More »

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