प्रयागराज, 3 फरवरी 2026:
यूपी में बेसिक शिक्षा विभाग में हुई सहायक अध्यापकों की नियुक्तियों पर अब बड़ी कार्रवाई तय मानी जा रही है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी पाने के मामलों को बेहद गंभीर बताते हुए पूरे प्रदेश में छह माह के भीतर सभी नियुक्तियों की गहन जांच के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि धोखाधड़ी से प्राप्त की गई नियुक्तियां न केवल अवैध हैं, बल्कि इससे शिक्षा व्यवस्था की नींव कमजोर होती है और छात्रों के भविष्य के साथ सीधा अन्याय होता है।
यह सख्त टिप्पणी न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने गरिमा सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। मामला देवरिया जिले के एक उच्चतर प्राथमिक विद्यालय से जुड़ा है, जहां गरिमा सिंह पर गलत प्रमाण पत्रों के आधार पर सहायक अध्यापक के रूप में नियुक्ति लेने का आरोप है। उनकी नियुक्ति निरस्त किए जाने के आदेश को चुनौती दी गई थी लेकिन हाईकोर्ट ने विभागीय कार्रवाई को सही ठहराया।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यह बेहद चिंताजनक है कि कई शिक्षक वर्षों तक फर्जी प्रमाण पत्रों के सहारे सेवा में बने रहते हैं। यह अधिकारियों की मिलीभगत के बिना संभव नहीं हो सकता। ऐसी नियुक्तियां नियमों का उल्लंघन होने के साथ शिक्षा की गुणवत्ता पर भी गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
हाईकोर्ट ने प्रमुख सचिव (बेसिक शिक्षा) को निर्देश दिया है कि प्रदेशभर में शिक्षकों की नियुक्तियों की जांच कराई जाए। यदि कोई नियुक्ति फर्जी पाई जाती है तो उसे तत्काल रद्द किया जाए और अब तक दिए गए वेतन की वसूली भी की जाए। इसके साथ ही जांच में लापरवाही या मिलीभगत सामने आने पर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने के भी आदेश दिए गए हैं। इस फैसले से बेसिक शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है और हजारों शिक्षकों की नियुक्तियों की दोबारा पड़ताल की तैयारी शुरू हो गई है।






