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UP : पुलिस मुठभेड़ों में ‘पैर में गोली’ पर हाईकोर्ट सख्त, आला अफसरों को दी ये हिदायत

एक मामले की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी आरोपी को सजा देने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है, पुलिस के पास नहीं, अपर मुख्य सचिव (गृह) और डीजीपी ने रखा अपना पक्ष

प्रयागराज, 31 जनवरी 2026:

यूपी में पुलिस मुठभेड़ों के दौरान आरोपियों के पैरों में गोली मारने की बढ़ती घटनाओं पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर नाराजगी जताते हुए इसे कानून के शासन और संवैधानिक मर्यादाओं के खिलाफ करार दिया है। कोर्ट ने दो टूक कहा कि किसी भी आरोपी को सजा देने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है, पुलिस के पास नहीं।

जस्टिस अरुण कुमार सिंह ने राजू नामक आरोपी की जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान यह अहम टिप्पणी करते हुए उसे सशर्त जमानत प्रदान की। सुनवाई के समय याची के अधिवक्ता कुसुम मिश्रा ने दलील दी कि राजू को झूठे मुकदमे में फंसाया गया है। कथित पुलिस मुठभेड़ में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया गया।

मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने अपर मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद और डीजीपी राजीव कृष्ण को तलब किया। दोनों वरिष्ठ अधिकारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश हुए और अदालत को बताया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के लिए पुलिस विभाग में सर्कुलर जारी कर दिए गए हैं। उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि उल्लंघन करने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख़्त कार्रवाई की जाएगी।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है जिसे संविधान के अनुसार ही चलाया जाना चाहिए। इसमें विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की भूमिकाएं स्पष्ट रूप से तय हैं। पुलिस अधिकारियों को न तो आरोपी को सजा देने का अधिकार है और न ही हाथ या पैर जैसे अंगों पर गैरजरूरी तरीके से गोली मारने की अनुमति दी जा सकती है।

पीठ ने चिंता जताते हुए कहा कि हाल के दिनों में चोरी और लूट जैसे छोटे अपराधों में भी पुलिस मुठभेड़ दिखाकर आरोपियों के पैरों में गोली मारने की घटनाएं सामने आ रही हैं। मौजूदा मामले में किसी भी पुलिसकर्मी को चोट न लगना संदेह पैदा करता है।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि मुठभेड़ में मौत या गंभीर चोट की स्थिति में तत्काल एफआईआर दर्ज की जाए और जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी जैसे सीबीसीआईडी या अन्य थाने की टीम से कराई जाए। घायल आरोपी का बयान मजिस्ट्रेट या मेडिकल अधिकारी के समक्ष दर्ज होना अनिवार्य होगा।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि मुठभेड़ के तुरंत बाद संबंधित पुलिसकर्मियों को कोई पुरस्कार या पदोन्नति नहीं दी जाएगी। इन निर्देशों के उल्लंघन पर मुठभेड़ करने वाली टीम के साथ-साथ संबंधित जिले के एसपी, एसएसपी या पुलिस कमिश्नर भी अदालत की अवमानना के दोषी माने जाएंगे।

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