लखनऊ/चित्रकूट, 19 मार्च 2026:
यूपी का भारतीय ज्ञान परंपरा और वैश्विक चिंतन का संगम बनने जा रहा है। चित्रकूट में आज से 21 मार्च तक उत्तर भारत दर्शन परिषद का 40वां राष्ट्रीय अधिवेशन और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित होगी। यह आयोजन भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद के सहयोग से जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग राज्य विश्वविद्यालय परिसर में अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के साथ संयुक्त रूप से किया जा रहा है।
संगोष्ठी का मुख्य विषय ‘वैश्विक शांति : चुनौतियां और समाधान’ रखा गया है। इसमें देश-विदेश के विद्वान समकालीन समस्याओं के समाधान भारतीय दर्शन के दृष्टिकोण से तलाशेंगे। कार्यक्रम का शुभारंभ 19 मार्च को उद्घाटन सत्र से होगा जिसमें 40वें अधिवेशन की औपचारिक शुरुआत की जाएगी। पहले दिन कई प्रतिष्ठित स्मृति व्याख्यान आयोजित होंगे। उनमें प्रो. संगम लाल पाण्डेय स्मृति व्याख्यान (डॉ. ए.के. पाण्डेय), देवात्म व्याख्यान (प्रो. स्नेहलता पाठक), योग विज्ञानी महाराज स्मृति व्याख्यान (डॉ. उत्तम सिंह), प्रो. देवकीनंदन द्विवेदी स्मृति व्याख्यान (प्रो. राकेश चंद्रा) और प्रो. रामलाल सिंह स्मृति व्याख्यान (डॉ. सुचेता शुक्ला) शामिल हैं।
इसके साथ ही परिषद की कार्यकारिणी व सामान्य सभा की बैठक और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होंगे। 20 मार्च को कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहेगा पद्म विभूषण जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य का मुख्य उद्बोधन। इसमें वे ‘भारतीय दर्शन में सनातन धर्म की मीमांसा’ विषय पर अपने विचार रखेंगे। इस दिन सनातन परंपरा, विपश्यना, आधुनिकता, समकालीन भारतीय चिंतन और अनुप्रयुक्त नीतिशास्त्र जैसे विषयों पर तकनीकी सत्र आयोजित किए जाएंगे।
अधिवेशन के अंतिम दिन 21 मार्च को शोधपत्र वाचन और तकनीकी सत्र होंगे। इनमें शोधार्थियों और युवा शिक्षकों के शोधपत्रों का मूल्यांकन कर उन्हें पुरस्कृत भी किया जाएगा। समापन समारोह के साथ तीन दिवसीय मंथन का निष्कर्ष सामने आएगा। प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि दर्शन केवल शास्त्रों तक सीमित नहीं बल्कि जीवन को दिशा देने वाली चेतना है जो समाज को शांति, संतुलन और सह-अस्तित्व का मार्ग दिखाती है। उन्होंने कहा कि ऐसे मंच विचारों के आदान-प्रदान को नई ऊर्जा देते हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा के माध्यम से वैश्विक चुनौतियों के समाधान खोजने की प्रेरणा देते हैं।
उन्होंने आगे कहा कि भारत की दार्शनिक विरासत विश्व को ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का संदेश देती है। प्रदेश को ज्ञान, शोध व सांस्कृतिक विमर्श का वैश्विक केंद्र बनाने की दिशा में यह आयोजन महत्वपूर्ण कदम है। गौरतलब है कि उत्तर भारत दर्शन परिषद की स्थापना 1975 में स्वर्गीय प्रो. संगम लाल पाण्डेय द्वारा की गई थी जो दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में शोध, प्रकाशन और अकादमिक गतिविधियों के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। परिषद की ‘संदर्शन’ पत्रिका दार्शनिक विचारों को व्यापक मंच प्रदान करती है।
वहीं, 2001 में स्थापित जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग राज्य विश्वविद्यालय देश का पहला ऐसा विश्वविद्यालय है जो विशेष रूप से दिव्यांगजनों को उच्च शिक्षा प्रदान करता है। यहां बीए, एमए, डिप्लोमा और पीएचडी स्तर तक के पाठ्यक्रम संचालित होते हैं। इसके साथ ही 1985 में स्थापित अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान बौद्ध धर्म, संस्कृति और इतिहास के संरक्षण व अध्ययन का प्रमुख केंद्र है। इसमें 12 हजार से अधिक पुस्तकों का समृद्ध पुस्तकालय उपलब्ध है और पालि व सिंहली भाषाओं के साथ बौद्ध अध्ययन के पाठ्यक्रम संचालित किए जाते हैं।
तीन दिनों तक चलने वाला यह आयोजन शैक्षणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के साथ वैश्विक शांति और सह-अस्तित्व की दिशा में भारतीय दर्शन की भूमिका को भी नई पहचान देगा।






