Uttarakhand

उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों पर कड़ी नजर : वाडिया इंस्टीट्यूट नोडल एजेंसी, लगेंगे सेंसर और सायरन

राज्य में मौजूद 968 ग्लेशियरों से जुड़ी करीब 1200 ग्लेशियर झीलों की वैज्ञानिक निगरानी अब एक समन्वित प्रणाली के तहत की जाएगी

योगेंद्र मलिक

देहरादून, 20 जनवरी 2026:

हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते जलवायु जोखिमों को देखते हुए उत्तराखंड शासन ने ग्लेशियर झीलों की निगरानी और सुरक्षा को लेकर बड़ा और अहम फैसला लिया है। राज्य में मौजूद 968 ग्लेशियरों से जुड़ी करीब 1200 ग्लेशियर झीलों की वैज्ञानिक निगरानी अब एक समन्वित प्रणाली के तहत की जाएगी। इनमें से पांच झीलों को अत्यंत संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। यहां से भविष्य में ग्लेशियर झील विस्फोट (GLOF) का खतरा बना रह सकता है।

राज्य सरकार ने देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी को इस पूरी प्रक्रिया के लिए नोडल एजेंसी नामित किया है। मुख्य सचिव के निर्देश पर लिए गए इस फैसले पर वाडिया इंस्टीट्यूट ने सहमति जता दी है। अब यह संस्थान राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआईएच), भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई), केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी), भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) और अन्य केंद्रीय संस्थानों के साथ मिलकर काम करेगा।

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मालूम हो कि वर्ष 2024 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने हिमालयी ग्लेशियर झीलों पर एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की थी। रिपोर्ट में उत्तराखंड की 1200 झीलों में से 13 को संवेदनशील और अतिसंवेदनशील बताया गया था। इसके बाद राज्य आपदा प्रबंधन विभाग ने निगरानी की प्रक्रिया शुरू की।

चमोली जिले की वसुधारा ग्लेशियर झील का अध्ययन पूरा हो चुका है, जबकि पिथौरागढ़ जिले की चार अतिसंवेदनशील झीलों में से दो पर 2025 में अध्ययन के लिए टीम गठित की गई थी, लेकिन मानसून आपदा के चलते काम बीच में रुक गया।

आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन ने बताया कि अब आपदा प्रबंधन विभाग की भूमिका केवल समन्वय तक सीमित रहेगी। वाडिया इंस्टीट्यूट मौजूदा आंकड़ों और विभिन्न संस्थानों की रिपोर्ट्स के आधार पर आगे की रणनीति तैयार करेगा। हर संवेदनशील झील पर सेंसर और सायरन लगाए जाएंगे जिनकी तकनीकी स्पेसिफिकेशन वाडिया तय करेगा।

इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत के अनुसार यह काम दो स्तरों ऑपरेशनल और रिसर्च पर किया जाएगा। फिलहाल प्राथमिकता ऑपरेशनल स्तर पर तेजी से काम शुरू करने की है, ताकि संभावित आपदाओं से समय रहते निपटा जा सके।

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