न्यूज डेस्क, 2 जून 2026:
कभी AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) को सिर्फ मनोरंजन का साधन समझा जाता था। अक्सर लोग चैटिंग या फिल्टर्ड तस्वीरें बनाए के लिए इसका इस्तेमाल करते थे। लोगों को लगता था कि यह केवल मोबाइल और सोशल मीडिया तक सीमित एक नया ट्रेंड है। लेकिन अब वही एआई इंसानी जिंदगी बचाने का जरिया बनता जा रहा है। कैंसर की पहचान से लेकर नई दवाओं की खोज, रोबोटिक सर्जरी से लेकर 24 घंटे मरीजों की निगरानी तक एआई चिकित्सा जगत में नई उम्मीद बनकर उभरा है। स्वास्थ्य सेवाओं की इसी बदलती तस्वीर को समझने के लिए आइए जानते हैं कि आखिर एआई कैसे इलाज को तेज, सटीक और पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित बना रहा है
बीमारियों की सटीक पहचान संभव
चिकित्सा जगत में सबसे बड़ी चुनौती किसी बीमारी का सही समय पर पता लगाना है। एआई एल्गोरिदम, एक्स-रे, सीटी स्कैन और एमआरआई जैसी मेडिकल इमेज को इंसानी डॉक्टरों की तुलना में अधिक सटीकता और तेजी से स्कैन कर सकते हैं। यह शुरुआती स्टेज में ही ट्यूमर या कैंसर कोशिकाओं को पकड़ लेता है। एआई, मरीज के पुराने मेडिकल डेटा और जीवनशैली का विश्लेषण करके यह बता सकता है कि उसे भविष्य में दिल का दौरा पड़ने की कितनी संभावना है।

एम्स (AIIMS) नई दिल्ली, देश का ये प्रतिष्ठित संस्थान रोबोटिक सर्जरी में एक मिसाल बन चुका है। एम्स दिल्ली ने ‘दा विंची सर्जिकल सिस्टम’ की मदद से 1,000 से अधिक सफल रोबोटिक ऑपरेशनों का आंकड़ा पार कर लिया है।
दवाओं की खोज में हो रही तेजी
पारंपरिक तरीके से किसी बीमारी की एक नई दवा और उसे बाजार में लाने में लगभग 10 से 12 साल का समय और अरबों डॉलर का खर्च आता है। एआई इस समय को घटाकर कुछ महीने या साल तक का कर रहा है। यह लाखों रासायनिक संयोजनों का विश्लेषण कंप्यूटर पर ही कुछ दिनों में कर लेता है जिससे घातक बीमारियों की जीवन रक्षक दवाएं बहुत तेजी से विकसित हो सकती हैं। उत्तर प्रदेश के नोएडा स्थित अपोलो और फोर्टिस जैसे कई बड़े अस्पतालों में एआई और एडवांस्ड रोबोटिक प्रोसीजर्स (जैसे दा विंची सिस्टम) के जरिए फेफड़ों के ट्रांसप्लांट की सर्जरी और महिलाओं की गायनेकोलॉजी से जुड़ी सर्जरी को स्मार्ट और सुरक्षित बनाया जा रहा है।
व्यक्तिगत चिकित्सा में भी सहायक
हर इंसान का शरीर और उसका डीएनए अलग होता है इसलिए एक ही दवा हर मरीज पर एक जैसा असर नहीं करती। एआई, मरीज के जेनेटिक कोड, मेडिकल हिस्ट्री और वर्तमान स्थिति का बारीकी से अध्ययन करता है। इसके आधार पर डॉक्टरों को यह सटीक सुझाव मिलता है कि मरीज को कौन सी दवा और कितनी मात्रा में दी जानी चाहिए ताकि साइड-इफेक्ट्स कम से कम हों।
स्मार्टवॉच और अन्य पहनने योग्य उपकरण अब केवल फिटनेस ट्रैकर नहीं रहे बल्कि ये मिनी-मेडिकल डिवाइस बन चुके हैं। ये उपकरण लगातार मरीज के दिल की धड़कन, ब्लड प्रेशर और ऑक्सीजन लेवल पर नजर रखते हैं। यदि शरीर के मानकों में कोई गंभीर गिरावट आती है तो एआई तुरंत डॉक्टर या आपातकालीन संपर्क को अलर्ट भेज देता है जिससे अस्पताल पहुंचने से पहले ही मरीज की जान बचाई जा सकती है।

एआई से संचालित रोबोटिक सर्जरी
जटिल ऑपरेशनों में एआई से संचालित रोबोटिक टूल्स डॉक्टरों के सबसे बड़े मददगार बन चुके हैं। ये रोबोट इंसानी हाथों की तुलना में बिना कांपे, बेहद बारीक और संवेदनशील जगहों पर सर्जरी कर सकते हैं। इसका फायदा यह होता है कि ऑपरेशन के दौरान शरीर में बहुत छोटा चीरा लगाना पड़ता है, खून कम बहता है और मरीज की रिकवरी बहुत तेजी से होती है। चीन के वुहान शहर में बैठे भारतीय यूरोलॉजिस्ट डॉ. सैयद मोहम्मद गौस ने एडवांस रोबोटिक सिस्टम की मदद से हैदराबाद में मौजूद एक मरीज का सफल ऑपरेशन किया। लगभग 3000 किलोमीटर की दूरी होने के बावजूद, एआई और हाई-स्पीड इंटरनेट के तालमेल से डॉक्टरों ने 90 मिनट के भीतर इस जटिल सर्जरी को बिना किसी रुकावट के पूरा कर दिखाया।
ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में वरदान
भारत जैसे विशाल देश में जहां ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है वहां एआई एक सेतु का काम कर रहा है। एआई आधारित ऐप्स के जरिए मरीज दूर बैठे ही अपनी प्राथमिक जांच करवा सकते हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के सामान्य डॉक्टर भी एआई टूल्स की मदद से मरीजों की गंभीर बीमारियों का प्रारंभिक स्तर पर सही इलाज शुरू कर पाते हैं।
लेकिन चुनौतियां भी हैं सामने
जहां एक तरफ एआई स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए किसी वरदान से कम नहीं है वहीं इसके साथ डेटा गोपनीयता और मरीजों के मेडिकल रिकॉर्ड की सुरक्षा जैसी चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। इसके बावजूद यह कहना गलत नहीं होगा कि आने वाले समय में एआई और डॉक्टरों की साझेदारी चिकित्सा जगत को एक नए और सुरक्षित भविष्य की ओर ले जा सकती है।






