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जज को फोन, कथित दबाव और हाईकोर्ट की सख्ती! कमिश्नर दुर्गा शक्ति नागपाल पर आपराधिक अवमानना की तलवार

यूपी के गोंडा के करीब तीन दशक पुराने भूमि विवाद में सुनवाई कर रहीं सिविल जज ने देवीपाटन की मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति पर फोन कर दबाव बनाने का आरोप लगाया, हाईकोर्ट ने कहा- न्यायाधीश को प्रभावित करने का प्रयास न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार

लखनऊ, 24 अगस्त 2026:

यूपी के गोंडा में करीब तीन दशक से लंबित भूमि विवाद की सुनवाई के दौरान न्यायपालिका और प्रशासन के बीच कथित दबाव को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने कहा कि किसी न्यायिक अधिकारी को फोन कर उसके न्यायिक कार्य को प्रभावित करने का प्रयास न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार है। इससे न्याय प्रशासन में बाधा उत्पन्न होती है। अदालत ने मामले को आपराधिक अवमानना के तहत विचार किए जाने योग्य माना है।

न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी की एकल पीठ ने यह टिप्पणी ज्योति विद्या मंदिर स्कूल की ओर से नगर पालिका परिषद गोंडा के खिलाफ वर्ष 1997 से लंबित मुकदमे को दूसरी अदालत में स्थानांतरित किए जाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए की। कोर्ट ने निर्देश दिया कि मुख्य न्यायाधीश अथवा वरिष्ठ न्यायाधीश से आवश्यक दिशा-निर्देश प्राप्त करने के बाद मामले को संबंधित अवमानना अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।

जानिए क्या है पूरा मामला?

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विवाद देवीपाटन मंडल के आयुक्त के नाम दर्ज कई नजूल भूमि के टुकड़ों से जुड़ा है। मंडलायुक्त की ओर से अदालत में रखे गए पक्ष के अनुसार यह जमीन कार्यालय भवन और अन्य सरकारी कार्यों के लिए आरक्षित थी। आरोप है कि इसी जमीन पर स्कूल भवन का निर्माण कर दिया गया। मामला करीब 29 वर्षों से सिविल कोर्ट में लंबित है। फिलहाल साक्ष्य के चरण में था। मामले में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश भी जारी है।

स्कूल की ओर से आरोप लगाया गया कि राज्य के अधिकारी अपने पद का इस्तेमाल करते हुए अदालत की कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। इसी आधार पर मुकदमे को देवीपाटन मंडल से बाहर किसी अन्य अदालत में स्थानांतरित करने की मांग की गई।

15 जुलाई के फोन कॉल ने बढ़ाई गंभीरता

सुनवाई के दौरान गोंडा की सिविल जज (सीनियर डिवीजन) शबीना खान द्वारा 4 अगस्त को जनपद न्यायाधीश को भेजा गया पत्र भी अदालत के सामने रखा गया। पत्र के अनुसार मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल ने 15 जुलाई को सिविल जज को फोन किया था। आरोप है कि जज ने लंबित मुकदमे से संबंधित बातचीत करने से इनकार किया तो बातचीत के दौरान उन्हें कथित तौर पर भला-बुरा कहा गया। इसके बाद सिविल जज ने संबंधित मुकदमे को अपनी अदालत से स्थानांतरित करने का अनुरोध भी किया।
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‘न्यायिक अधिकारी बिना भय के काम करें’

हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा कि सिविल जज द्वारा बताए गए बातचीत के लहजे और भाषा से प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि पीठासीन अधिकारी को प्रभावित करने का प्रयास किया गया। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि मंडलायुक्त ने फोन किए जाने से इनकार नहीं किया है।

‘न्यायालय पर दबाव बनाने का प्रयास न्याय प्रक्रिया में सीधा हस्तक्षेप’

अदालत ने स्पष्ट किया कि अधीनस्थ अदालतों को किसी भी प्रकार के अपमान, धमकी या दबाव से सुरक्षित रखा जाना चाहिए। पीठासीन अधिकारियों को बिना किसी भय या बाहरी प्रभाव के अपने न्यायिक दायित्वों का निर्वहन करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए भी कहा कि न्यायिक कार्यवाही से जुड़े मामलों में न्यायाधीशों को धमकी या दबाव देने की किसी भी कोशिश को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। अदालत ने साफ किया कि किसी व्यक्ति, पक्षकार, अधिवक्ता या अधिकारी द्वारा न्यायालय पर दबाव बनाने का प्रयास न्याय प्रक्रिया में सीधा हस्तक्षेप है।

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Rakesh Kumar Verma

राकेश कुमार वर्मा एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। इन्हें मीडिया जगत में लगभग 31 वर्षों का व्यापक और समृद्ध अनुभव है। इन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों ही माध्यमों में कार्य करते हुए अपनी मजबूत और प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई है। यूपी की राजधानी लखनऊ में स्वतंत्र भारत, राष्ट्रीय सहारा, जनसत्ता एक्सप्रेस,… More »

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