Lucknow News: CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सड़कों पर संग्राम, SIR पर रोक से लेकर उठाए 6 बड़े सवाल
भाकपा (माले) ने परिवर्तन चौक से कलेक्ट्रेट तक निकाला विरोध मार्च, राष्ट्रपति को भेजा ज्ञापन, मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने और मतदाता सूची से हटाए गए पात्र मतदाताओं के नाम बहाल करने की मांग, नेताओं की नजरबंदी और हिरासत पर भी सरकार को घेरा

लखनऊ, 10 अक्टूबर 2026:
देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देशव्यापी विरोध की आंच शनिवार को राजधानी लखनऊ में भी दिखाई दी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन यानी भाकपा (माले) ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया पर रोक लगाने, निर्वाचन आयोग की जवाबदेही तय करने और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की मांग को लेकर परिवर्तन चौक से कलेक्ट्रेट तक विरोध मार्च निकाला। मार्च के बाद पार्टी के प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति को संबोधित छह सूत्रीय ज्ञापन सिटी मजिस्ट्रेट को सौंपा। प्रदर्शनकारियों ने ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के साथ हिरासत में लिए गए राजनीतिक कार्यकर्ताओं की तत्काल रिहाई की मांग भी उठाई।
CEC को हटाने की मांग ने पकड़ा जोर
भाकपा (माले) ने निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। ज्ञापन में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने, SIR पर रोक लगाने और मतदाता सूची से गलत तरीके से हटाए गए पात्र मतदाताओं के नाम बहाल करने की मांग की गई। पार्टी ने निर्वाचन आयोग की स्वतंत्र एवं लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की सदस्यता वाली चयन समिति गठित करने की भी मांग रखी। इसके अलावा दोषपूर्ण SIR के आधार पर संपन्न चुनावों को रद्द करने और विरोध प्रदर्शनों के दौरान गिरफ्तार या हिरासत में रखे गए नेताओं व कार्यकर्ताओं को तत्काल रिहा करने की मांग की गई।
लखनऊ में जिला सचिव नजरबंद, मेरठ में आइसा नेताओं को हिरासत में लेने का आरोप
प्रदर्शन के दौरान पार्टी ने आरोप लगाया कि देशभर में विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए पुलिसिया दमन का सहारा लिया जा रहा है। भाकपा (माले) के लखनऊ जिला सचिव रमेश सिंह सेंगर को 24 घंटे से घर में नजरबंद रखे जाने का दावा किया गया। वहीं, आइसा उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष मनीष कुमार और आइसा इलाहाबाद के सचिव भानु को मेरठ में यूपी एसटीएफ द्वारा हिरासत में लिए जाने का आरोप लगाया गया।
पार्टी ने दिल्ली में प्रदर्शनों को रोकने के लिए यातायात प्रतिबंधों, रेल सेवाओं में बाधा और भारी पुलिस तैनाती का भी विरोध किया। उसका कहना है कि शांतिपूर्ण असहमति जताना लोकतांत्रिक अधिकार है। इसे दबाने के लिए हिरासत या नजरबंदी का सहारा लेना गंभीर चिंता का विषय है।

निर्वाचन आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली पर भी उठाए सवाल
मार्च में वक्ताओं ने 23 सितंबर को एक अंग्रेजी अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट का हवाला देते हुए निर्वाचन आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उनके मुताबिक रिपोर्ट में निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर लिखित आपत्तियां दर्ज किए जाने की बात कही गई थी। इनमें मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने और मतदाता डेटाबेस तक पहुंच केंद्रीकृत करने से जुड़े मुद्दे शामिल बताए गए।
पार्टी ने इन मामलों की स्वतंत्र जांच और सार्वजनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की। हालांकि, निर्वाचन आयोग ने इन आपत्तियों को निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बताते हुए अपने फैसलों को सर्वसम्मत बताया है।
महिलाओं, मजदूरों और युवाओं के मताधिकार का मुद्दा भी उठाया
आइसा लखनऊ के अध्यक्ष शांतम निधि ने कहा कि चुनावी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा बनाए रखना जरूरी है। इंकलाबी नौजवान सभा के संयुक्त सचिव राजीव गुप्ता ने युवाओं की लोकतांत्रिक भागीदारी और विरोध के अधिकार पर जोर दिया।
वहीं, ऐपवा की संयोजक सरोजिनी बिष्ट ने आशंका जताई कि दस्तावेजों की कमी के कारण गरीब महिलाओं, दलितों, अल्पसंख्यकों और वंचित समुदायों के मताधिकार पर असर पड़ सकता है।
एक्टू के सचिव मधुसूदन मगन ने कहा कि प्रवासी, असंगठित और दिहाड़ी मजदूरों के लिए निवास व पहचान संबंधी दस्तावेज जुटाना कठिन होता है। इसलिए पुनरीक्षण प्रक्रिया में उनकी परिस्थितियों का ध्यान रखा जाना चाहिए। भाकपा (माले) ने स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता, मताधिकार की रक्षा और शांतिपूर्ण विरोध की स्वतंत्रता के सवाल पर उसका संघर्ष जारी रहेगा। पार्टी के मुताबिक लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा एक-दूसरे से जुड़े मुद्दे हैं। इनसे समझौता नहीं किया जा सकता।






