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अंदर से कितने बूढ़े या कितने जवान…ये तकनीक बताएगी अंगों की असली उम्र

स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने विकसित की प्लाज्मा प्रोटिओमिक्स तकनीक, बीमारियों के खतरे का पहले से लगाया जा सकेगा अनुमान

न्यूज डेस्क, 17 जून 2026:

क्या आपका दिल, दिमाग या किडनी आपकी वास्तविक उम्र से ज्यादा बूढ़े हो चुके हैं? अब इसका जवाब सिर्फ एक खून की जांच से मिल सकता है। वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक विकसित की है जो यह बता सकती है कि शरीर के अंग अंदर से कितने स्वस्थ हैं और उनकी जैविक उम्र (बायोलॉजिकल एज) क्या है। इस तकनीक को ‘प्लाज्मा प्रोटिओमिक्स’ कहते हैं।

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अमेरिका के स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की अगुवाई में किए गए इस शोध में रक्त में मौजूद प्रोटीनों का विश्लेषण कर शरीर के अंगों की उम्र का आकलन किया गया। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तकनीक भविष्य में कई गंभीर बीमारियों का खतरा पहले से पहचानने में मददगार साबित हो सकती है।

दरअसल, हमारी जन्मतिथि के अनुसार जो उम्र होती है जरूरी नहीं कि शरीर के सभी अंग भी उसी गति से बूढ़े हो रहे हों। कुछ अंग तेजी से कमजोर हो सकते हैं जबकि कुछ लंबे समय तक युवा और स्वस्थ बने रह सकते हैं। नई जांच इसी अंतर को पहचानने का काम करती है।

40 से 70 वर्ष की आयु के करीब 45 हजार लोगों के स्वास्थ्य आंकड़ों का शोध के दौरान अध्ययन किया गया। वैज्ञानिकों ने प्रतिभागियों के रक्त में मौजूद लगभग 3 हजार प्रोटीनों की जांच कर पता लगाया कि शरीर के 11 प्रमुख अंगों की वास्तविक जैविक उम्र क्या है। अध्ययन में पाया गया कि करीब एक-तिहाई लोगों में कम से कम एक अंग ऐसा था जो उनकी वास्तविक उम्र की तुलना में काफी ज्यादा बूढ़ा या काफी युवा था।

शोध का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष मस्तिष्क को लेकर सामने आया। वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन लोगों का दिमाग जैविक रूप से ज्यादा वृद्ध था उनमें अल्जाइमर जैसी बीमारी होने का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में 3 गुना से अधिक था।

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शोधकर्ताओं के अनुसार, दिमाग की उम्र किसी व्यक्ति की लंबी उम्र का सबसे बड़ा संकेतक बनकर उभरी है। जिन लोगों का मस्तिष्क समय से पहले बूढ़ा पाया गया उनमें अगले 15 वर्षों के दौरान मृत्यु का खतरा काफी अधिक था। वहीं जिनका मस्तिष्क जैविक रूप से युवा था उनमें यह जोखिम काफी कम पाया गया।

वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह जांच स्वास्थ्य परीक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। इससे बीमारियों का खतरा पहले से पहचानकर समय रहते इलाज शुरू करना संभव हो सकेगा।

भारत के हेल्थ सेक्टर में जीनोमिक्स को लेकर काफी प्रयोग हो रहे हैं। डिकोड एज जैसी भारतीय कंपनियों ने पहले ही बुनियादी ब्लड-बेस्ड एजिंग टेस्ट के लिए टाटा 1एमजी जैसी लैब्स के साथ हाथ मिलाया हुआ है, इसलिए उम्मीद है कि अगले कुछ समय में वे वैश्विक स्तर पर स्वीकृत इस प्लाज्मा प्रोटिओमिक्स तकनीक को भी भारत में व्यावसायिक रूप से लॉन्च कर सकती है।

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