लखनऊ/शाहजहांपुर, 8 अगस्त 2026:
देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लेने वाले अमर शहीद क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह की जन्मभूमि नवादा ने आजाद भारत में भी विकास से दूरी का लंबा दर्द झेला। जिस मिट्टी ने देश को ऐसा वीर सपूत दिया, उसी गांव की तीन पीढ़ियां हर साल बारिश और बाढ़ के मौसम में खन्नौत नदी के कारण करीब चार से पांच महीने तक मुख्य मार्गों से कट जाती थीं। सरकारें बदलीं, दौर बदले, लेकिन गांव की यह पीड़ा बनी रही।
आखिरकार सीएम योगी आदित्यनाथ के हस्तक्षेप के बाद नवादा की तस्वीर बदली और पीपे के पुल की जगह खन्नौत नदी पर पक्का पुल बन सका। यह बदलाव केवल आवागमन की सुविधा नहीं बल्कि शहीद की जन्मभूमि को मिला सम्मान भी था। सीएम योगी ने पुल निर्माण के साथ गांव में सड़क और डिग्री कॉलेज जैसी परियोजनाओं को भी मंजूरी दी। 30 दिसंबर 2018 को मुख्यमंत्री स्वयं नवादा पहुंचे और ठाकुर रोशन सिंह के पैतृक घर जाकर उनके परिजनों से मुलाकात की। उन्होंने शहीद की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित की और परिवार के बुजुर्गों का सम्मान किया। वर्षों की उपेक्षा के बाद मुख्यमंत्री को अपने बीच देखकर कई ग्रामीणों और बुजुर्गों की आंखें नम हो गईं।

साहस ऐसा कि अंग्रेज अफसर की छीन ली बंदूक
ठाकुर रोशन सिंह का जन्म 19 दिसंबर 1892 को शाहजहांपुर के नवादा गांव में ठाकुर जंगी सिंह और कौशल्या देवी के घर हुआ था। बचपन से ही वह साहसी, कुशल पहलवान और अचूक निशानेबाज थे। युवावस्था में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़े और बाद में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) के सक्रिय क्रांतिकारी बन गए।
1922 में चौरी-चौरा कांड के विरोध में बरेली में हुए प्रदर्शन के दौरान अंग्रेजों ने लाठीचार्ज किया। रोशन सिंह भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़े और एक अंग्रेज अधिकारी की बंदूक छीन ली। उन्होंने हवा में फायरिंग कर लाठीचार्ज रुकवाया। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें दो वर्ष की कठोर कैद की सजा दी। जेल से निकलने के बाद उनका जीवन पूरी तरह क्रांतिकारी आंदोलन को समर्पित हो गया।
काकोरी कांड से जुड़ा नाम, फांसी से भी नहीं डरे
दिसंबर 1924 में एचआरए द्वारा संगठन के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से पीलीभीत की बिसलपुर तहसील के बमरौली गांव में की गई कार्रवाई में गोलीबारी के दौरान एक व्यक्ति की मौत हुई। ठाकुर रोशन सिंह पर हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ, लेकिन वह अंग्रेजों के हाथ नहीं आए। 1925 के काकोरी कांड के बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर मुकदमे में शामिल किया। काकोरी ट्रेन लूट में प्रत्यक्ष रूप से मौजूद न होने के बावजूद संगठन से जुड़े होने के कारण उन्हें पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और राजेंद्र नाथ लाहिड़ी के साथ दोषी ठहराया गया।
सजा सुनाए जाने के दौरान रोशन सिंह ने निर्भीकता से कहा- मुझे भी वही सजा दो जो बिस्मिल को मिली है। अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई। 19 दिसंबर 1927 को प्रयागराज की नैनी जेल में गीता का पाठ करने के बाद वंदे मातरम् का उद्घोष करते हुए उन्होंने फांसी का फंदा चूम लिया।
जिस नदी ने रोका, वही अब बनी विकास की राह
आज खन्नौत नदी पर बना पक्का पुल नवादा दरोवस्त और आसपास के गांवों के लिए लाइफलाइन बन चुका है। पहले बारिश में मरीज अस्पताल नहीं पहुंच पाते थे। बच्चों की पढ़ाई रुक जाती थी और किसानों की फसल समय पर बाजार नहीं पहुंच पाती थी। अब एंबुलेंस गांव तक पहुंच रही है। छात्र स्कूल-कॉलेज जा रहे हैं और किसानों की उपज आसानी से बाजार पहुंच रही है।
गांव में डिग्री कॉलेज और ठाकुर रोशन सिंह के पैतृक घर को स्मारक के रूप में विकसित किए जाने से नई पीढ़ी को उनके बलिदान से परिचित होने का अवसर भी मिल रहा है। नवादा की कहानी इसलिए महज एक पुल बनने की कहानी नहीं है। यह उस गांव की तीन पीढ़ियों के इंतजार की कहानी है, जिसने देश को अपना लाल दिया और बदले में दशकों तक विकास की राह देखी। आज खन्नौत का पुल उस इंतजार के खत्म होने और शहीद की जन्मभूमि को मिले सम्मान का प्रतीक बन चुका है।






