
लखनऊ, 18 जुलाई 2026:
यूपी में जल संरक्षण को जनभागीदारी से जोड़ने की मुहिम अब घरेलू आरओ सिस्टम से निकलने वाले ‘बर्बाद पानी’ को बचाने की दिशा में भी आगे बढ़ रही है। भूजल सप्ताह-2026 के तहत भूगर्भ जल विभाग की ओर से आयोजित ‘जल-संवाद’ कार्यक्रम में सहजन के बीज (मोरिंगा सीड्स) और स्कोरिया वॉल्केनिक रॉक यानी छिद्रयुक्त ज्वालामुखीय पत्थर के जरिए प्राकृतिक और कम लागत वाली जल शोधन तकनीक पर चर्चा हुई।
इस पहल के जरिए आरओ सिस्टम से फिल्टर के बाद निकलने वाले लाखों लीटर पानी को उपयोगी बनाने की संभावनाएं तलाशने पर सहमति बनी।कार्यक्रम की अध्यक्षता भूगर्भ जल विभाग के निदेशक डॉ. राजेश कुमार प्रजापति ने की। संवाद के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि मोरिंगा के बीजों का पाउडर पानी में मौजूद गंदगी और सूक्ष्म कणों को एकत्र कर उन्हें नीचे बैठाने में मदद कर सकता है। वहीं, स्कोरिया वॉल्केनिक रॉक की छिद्रयुक्त संरचना फिल्टर की तरह काम करते हुए पानी में मौजूद कुछ अशुद्धियों को कम करने में सहायक हो सकती है।

हालांकि, इस तकनीक को व्यापक रूप से लागू करने से पहले वैज्ञानिक शोध और परीक्षण जरूरी होंगे। भूगर्भ जल विभाग ने इस अवधारणा का स्वागत करते हुए आगे शोध, प्रोटोटाइप तैयार करने और उसकी टेस्टिंग की प्रक्रिया शुरू करने में रुचि दिखाई। यदि तकनीक प्रभावी साबित होती है तो आरओ से निकलने वाले पानी के पुन: उपयोग और जल संरक्षण के क्षेत्र में यह कम लागत वाला विकल्प बन सकता है।
‘जल-संवाद’ में विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों ने जल संकट से निपटने के लिए वर्षा जल संचयन, रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग और अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया। सुझाव दिया गया कि ऐसे गांवों, शहरों और आवासीय सोसाइटियों को विशेष प्रोत्साहन और पुरस्कार दिए जाएं, जो जल संरक्षण के क्षेत्र में बेहतर काम कर रहे हैं। इससे सकारात्मक प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और प्रेरणादायक मॉडल सामने आएंगे।
इसके अलावा रिमोट सेंसिंग और जीआईएस तकनीक के जरिए जल संरक्षण और भूजल भंडारण की मैपिंग से जुड़े शोध को भी अभियान से जोड़ने पर जोर दिया गया। डॉ. राजेश कुमार प्रजापति ने कहा कि दीर्घकालिक जल सुरक्षा के लिए समाज के हर वर्ग की सक्रिय भागीदारी जरूरी है। प्रत्येक नागरिक को जल संरक्षण को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाना होगा।






