Lucknow City

अटल के लिए लखनऊ सिर्फ शहर नहीं, घर था… हार से लेकर पांच बार सांसद बनने तक की कहानी

अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि पर विशेष : 1954, 1957 और 1962 में हार के बाद शहर ने निभाया जिंदगी भर का रिश्ता, सामुदायिक केंद्र, कल्याण मंडप, रैन बसेरों और सड़कों से जुड़े प्रयोगों ने बाद में देश की कई योजनाओं को दिखाई राह

लखनऊ, 16 अगस्त 2026:

पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न स्व. अटल बिहारी वाजपेयी और लखनऊ का रिश्ता राजनीति से बहुत आगे आत्मीयता का था। जन्म भले ही उनका ग्वालियर में हुआ लेकिन लखनऊ ने उन्हें केवल एक राजनेता के रूप में नहीं देखा। इस शहर ने अटल को संघ के स्वयंसेवक से प्रचारक, संपादक, पत्रकार और राजनीतिक कार्यकर्ता बनते देखा और फिर देश के सबसे लोकप्रिय नेताओं में शुमार होते भी देखा। यही वजह है कि अटल के लिए लखनऊ कोई चुनावी क्षेत्र नहीं अपितु उनका अपना घर था।

कभी जिस शहर में अटल लोगों के बीच अपनी पहचान बना रहे थे उसी लखनऊ ने आगे चलकर उन्हें अपना सांसद चुना। हालांकि यह सफर आसान नहीं था। 1954, 1957 और 1962 के चुनावों में हार के बाद अटल ने 1991 तक लखनऊ से लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा। मगर शहर से उनका रिश्ता कभी नहीं टूटा। वह लगातार लखनऊ आते-जाते रहे।
अटल जी और लखनऊ का रिश्ता: हार से 5 बार MP बनने की कहानी

जानकार बताते हैं कि 1991 में जब उन्होंने फिर लखनऊ से चुनाव लड़ने का फैसला किया तो उनका अंदाज भी अटल वाला ही था। मानो लखनऊ से कह रहे हों… आप लोगों ने सोचा था कि मुझसे पीछा छूट जाएगा लेकिन ऐसा होने वाला नहीं। मेरो मन अनत कहां सुख पावे, लखनऊ मेरा घर है। अटल ने चुनाव जीता और फिर ऐसा रिश्ता बना कि लखनऊ ने उन्हें लगातार पांच बार लोकसभा पहुंचाया।

ये भी पढ़ें:

सांसद बने तो शहर को प्रयोगशाला बनाया

लोकसभा में विपक्ष के नेता और बाद में देश के प्रधानमंत्री की जिम्मेदारियों के बावजूद अटल अपने संसदीय क्षेत्र से जुड़े सवालों को लेकर बेहद सजग रहते थे। उनके काम करने का अंदाज भी अलग था। वह लखनऊ में किसी जरूरत को महसूस करते तो उसके समाधान का प्रयोग करते और सफलता मिलने पर उसी सोच को व्यापक स्तर पर लागू करने की कोशिश करते।

मध्यम और गरीब परिवारों के सामने बच्चों के विवाह के लिए उपयुक्त और सस्ता स्थान उपलब्ध कराने की समस्या थी। इसी जरूरत से लखनऊ में सामुदायिक केंद्रों की अवधारणा को बल मिला। इसके बाद में कल्याण मंडपों का विस्तार हुआ। आज भी ये केंद्र आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए बड़ी राहत हैं, जहां समारोह के लिए जरूरी बर्तन जैसी सुविधाएं तक उपलब्ध होती हैं।
atal-ji-aur-lucknow-ka-rishta-haar-se-5-baar-mp-banne-ki-kahani (2)

गरीबों के लिए रैन बसेरे, मरीजों के तीमारदारों के लिए ठहरने की व्यवस्था, सस्ती दरों पर आवास, सड़कों का चौड़ीकरण और ग्रामीण इलाकों को बेहतर संपर्क देने जैसे कई काम उनके सांसद के रूप में सक्रिय सरोकार की कहानी कहते हैं। लखनऊ में किए गए ऐसे प्रयोगों को बाद की गरीब कल्याण और ग्रामीण संपर्क से जुड़ी योजनाओं की सोच से जोड़कर देखा जाता है।

लखनऊ से निकली सोच, देश तक पहुंची

अटल की सोच केवल लखनऊ तक सीमित नहीं थी। मध्यम वर्ग के लिए आसान शर्तों पर ऋण, वाहन ऋण की सुविधा और किसानों के लिए किसान क्रेडिट कार्ड जैसी पहल ने आम लोगों की आर्थिक जरूरतों को केंद्र में रखा। इसी तरह अच्छी और चौड़ी सड़कों पर उनका जोर बाद में देश के बड़े सड़क निर्माण अभियानों की पहचान बना।

लखनऊ में बड़े बौद्धिक और शैक्षिक आयोजनों के लिए साइंटिफिक कन्वेंशन सेंटर जैसी सोच भी उनके व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा रही। महोना क्षेत्र के गांवों को जोड़ने वाले रास्तों से लेकर शहर की बुनियादी सुविधाओं तक, उनका सांसद वाला रूप हमेशा जमीन से जुड़ा दिखाई देता था।

1942 में लखनऊ आए, ‘राष्ट्र धर्म’ से बनी नई पहचान

अटल बिहारी वाजपेयी 1942 में संघ प्रचारक के रूप में लखनऊ आए थे। यहीं पं. दीनदयाल उपाध्याय के मार्गदर्शन में उन्होंने वैचारिक पत्रिका ‘राष्ट्र धर्म’ के संपादन की जिम्मेदारी संभाली। पत्रकारिता और साहित्य के प्रति उनकी रुचि ने उन्हें लखनऊ के साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों के करीब पहुंचाया।
atal-ji-aur-lucknow-ka-rishta-haar-se-5-baar-mp-banne-ki-kahani (3)

कविता उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा थी। वीर रस की कविताओं का पाठ वह कवि सम्मेलनों से लेकर राजनीतिक कार्यक्रमों और सार्वजनिक सभाओं तक में करते थे। उनकी प्रसिद्ध कविता ‘हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय’ की पंक्तियां उनकी वैचारिक अभिव्यक्ति की पहचान बनीं।

उनकी कविता में इतिहास, राष्ट्र और समाज को लेकर उनका अपना नजरिया दिखाई देता था। ‘कोई बताये कब हमने काबुल में जाकर मस्जिद तोड़ी, भूभाग नहीं शत-शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय’ जैसी पंक्तियां उनकी विचारधारा को काव्यात्मक ढंग से सामने रखती हैं।

गोमती की चिंता से लेकर रिक्शे की सवारी तक

अटल का लखनऊ केवल राजनीति का लखनऊ नहीं था। गोमती नदी के प्रदूषण को लेकर भी उन्होंने चिंता जताई थी। उनका मानना था कि लखनऊ की पहचान से जुड़ी गोमती को स्वच्छ, सुघड़ और शहर की परंपरागत प्रतिष्ठा के अनुरूप स्वरूप मिलना चाहिए। राजनीतिक व्यस्तताओं के बीच विश्राम के लिए भी लखनऊ उन्हें बेहद प्रिय था। शहर के कई परिवारों से उनका इतना आत्मीय संबंध था कि वह बिना किसी औपचारिकता के रिक्शे पर बैठकर उनके घर पहुंच जाते थे। यही सहजता उन्हें आम लोगों के बीच अलग बनाती थी।

अटल ने लखनऊ को बहुत कुछ दिया लेकिन शायद उससे ज्यादा लखनऊ ने अटल को दिया। एक ऐसा अपनापन जिसने देश के सबसे बड़े नेताओं में से एक को भी इस शहर का अपना बना दिया। अटल और लखनऊ की कहानी को केवल सांसद और संसदीय क्षेत्र के रिश्ते में बांधना मुश्किल है। यह उस शहर और उसके ‘अटल’ के रिश्ते की कहानी है जहां दोनों सचमुच एक हो गए थे।

ये भी पढ़ें  लखनऊ के हजरतगंज सहित कई इलाकों में आज घंटों गुल रहेगी बिजली... ये मोहल्ले भी होंगे प्रभावित

Rakesh Kumar Verma

राकेश कुमार वर्मा एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। इन्हें मीडिया जगत में लगभग 31 वर्षों का व्यापक और समृद्ध अनुभव है। इन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों ही माध्यमों में कार्य करते हुए अपनी मजबूत और प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई है। यूपी की राजधानी लखनऊ में स्वतंत्र भारत, राष्ट्रीय सहारा, जनसत्ता एक्सप्रेस,… More »

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button