
लखनऊ, 24 अगस्त 2026:
यूपी में बच्चों को कुपोषण से बचाने की मुहिम अब सिर्फ पोषण सामग्री बांटने तक सीमित नहीं रह गई है। सरकार ने बच्चों की उम्र, उनकी पोषण संबंधी जरूरत और माताओं की स्थिति के अनुसार अलग-अलग पोषण उत्पाद उपलब्ध कराने पर जोर दिया है। टेक होम राशन (टीएचआर) योजना के तहत तैयार किए जा रहे सात तरह के उत्पादों के जरिए बच्चों और महिलाओं को ऊर्जा, प्रोटीन, आयरन समेत जरूरी पोषक तत्व उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है।
जरूरत आधारित पोषण पर फोकस
टीएचआर के तहत शिशु अमृत, शिशु आहार, बाल पुष्टिकर, संपूर्ण मातृ आहार, आरोग्य पोषण, बाल संजीवनी और सक्षम पोषण जैसे उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि छोटे बच्चों से लेकर गर्भवती और धात्री महिलाओं तक को उनकी जरूरत के मुताबिक पोषण मिल सके। यानी एक ही तरह का पोषण सभी के लिए देने के बजाय जरूरत आधारित पोषण पर फोकस किया गया है।
नौ साल में नाटेपन में आई बड़ी गिरावट
इस पोषण अभियान का असर बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़ों में भी दिखाई दे रहा है। वर्ष 2015-16 में बच्चों में नाटेपन की दर 46.3 प्रतिशत थी। यह 2019-21 में घटकर 39.7 प्रतिशत रह गई। अब यह आंकड़ा 31.5 प्रतिशत तक पहुंच गया है। अल्पवजन और दुबलेपन जैसी समस्याओं में भी सुधार दर्ज किया गया है।
आंगनबाड़ी बनी बच्चों की सेहत की निगरानी का केंद्र
पोषण सामग्री पहुंचाने के साथ आंगनबाड़ी केंद्रों को बच्चों की सेहत की लगातार निगरानी से जोड़ा गया है। आंगनबाड़ी कार्यकत्रियां बच्चों का वजन मापने, उनके विकास पर नजर रखने और गर्भवती व धात्री महिलाओं को पोषण संबंधी सलाह देने का काम कर रही हैं। परिवारों को संतुलित भोजन और पोषण के महत्व के प्रति जागरूक करने पर भी जोर है। इस मॉडल का उद्देश्य सिर्फ राशन घर तक पहुंचाना नहीं है। यह पता लगाना भी है कि बच्चे की वास्तविक जरूरत क्या है। उसके विकास की स्थिति कैसी है। इसी वजह से पोषण सेवाओं को निगरानी और जागरूकता से जोड़ा गया है।

पोषण की थाली से महिलाओं की कमाई तक
टीएचआर योजना की एक खास बात यह भी है कि इसे ग्रामीण महिलाओं की आजीविका से जोड़ा गया है। उत्पादन और आपूर्ति की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़े महिला स्वयं सहायता समूहों को दी गई है। वर्तमान में 4,000 से अधिक महिलाएं इन उत्पादन इकाइयों से जुड़कर रोजगार हासिल कर रही हैं। इससे गांवों में महिलाओं के लिए स्थानीय स्तर पर आय का अवसर पैदा हुआ है। पोषण उत्पाद बनाने से लेकर उनकी आपूर्ति तक महिलाओं की भागीदारी ने इस योजना को बच्चों की सेहत के साथ-साथ महिला सशक्तीकरण का माध्यम भी बना दिया है।
बच्चों के खाने की गुणवत्ता पर भी नजर
बाल विकास एवं पुष्टाहार तथा राज्य पोषण मिशन की निदेशक हर्षिता माथुर ने आंगनबाड़ी केंद्रों पर मिलने वाले पोषाहार की गुणवत्ता और स्वच्छता को लेकर सख्त निर्देश दिए हैं। खाद्य सामग्री को अच्छी तरह साफ करने और हरी सब्जियों को दो से तीन बार पानी से धोने के निर्देश हैं। बच्चों को भोजन परोसने से पहले हर दिन कम से कम दो वयस्कों द्वारा उसकी गुणवत्ता की जांच भी सुनिश्चित करने को कहा गया है। नौ वर्षों में डिजिटल निगरानी, पारदर्शी वितरण और स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी के जरिए पोषण सेवाओं को अधिक व्यवस्थित बनाने पर जोर दिया गया है।






