
योगेंद्र मलिक
पौड़ी गढ़वाल, 29 अगस्त 2026ः
उत्तराखंड की धामी सरकार महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई योजनाएं चला रही है, जिससे वे अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर अन्य महिलाओं का सहारा बन सकें। ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत महिलाएं अब रोजगार की तलाश में गांव से बाहर जाने के बजाय स्थानीय स्तर पर ही स्वरोजगार के अवसर तैयार कर आत्मनिर्भर बन रही हैं। स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर महिलाएं अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करने के साथ ही अन्य महिलाओं को भी अपने पैरों पर खड़े होने का मौका दे रही हैं। पौड़ी के खांड्यूंसैंण निवासी दो महिलाएं इसकी मिसाल हैं।
हर महीने 15 हजार रुपये की हो रही इनकम
मां भगवती स्वयं सहायता समूह से जुड़ी कलावती को हिमोत्थान सोसाइटी की ओर से 20 हजार रुपये का अनुदान मिला, जिससे उन्होंने सिलाई मशीन खरीदी। इसके अलावा उन्होंने समूह की अन्य महिलाओं के साथ आरसेटी से 13 दिवसीय जूट बैग निर्माण का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। वर्तमान में वह सिलाई के साथ ब्यूटी पार्लर का कार्य कर रही हैं। उनके स्वरोजगार से एक अन्य महिला को भी रोजगार मिला है। कलावती ने बताया कि जल्द ही जूट बैग निर्माण का कार्य भी शुरू किया जाएगा। इसमें स्वयं सहायता समूह की अन्य महिलाओं को जोड़ा जाएगा। वर्तमान में उन्हें प्रतिमाह करीब 15 हजार रुपये की आय हो रही है, जबकि लगभग 10 से 12 हजार रुपये तक की बचत हो जाती है। उन्होंने कहा कि स्वरोजगार शुरू करने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है।

खोली दुकान, स्थानीय उत्पादों को मिला बाजार
वहीं, पौड़ी मुख्यालय के पास ग्राम गहड़ निवासी रामेश्वरी देवी ने पुलिस लाइन के पास ग्राम दुकान शुरू की है। डांडा नागराजा स्वयं सहायता समूह से जुड़ी रामेश्वरी दुकान में मंडुवा, झंगोरा, पहाड़ी दाल, जैम, अचार, बद्री गाय का घी और स्थानीय सब्जियों समेत विभिन्न पहाड़ी उत्पाद बेच रही हैं। इससे उन्हें प्रतिमाह करीब छह से सात हजार रुपये की शुद्ध आय हो रही है। रामेश्वरी ने वर्ष 2025 में एनआरएलएम, नाबार्ड और हिमोत्थान सोसाइटी के सहयोग से तीन लाख रुपये का सीसीएल ऋण लेकर ग्राम दुकान शुरू की। इससे स्थानीय उत्पादों को बाजार मिलने के साथ उनकी आय का स्थायी साधन भी तैयार हुआ है। ब्लॉक मिशन मैनेजर विजय बिष्ट ने बताया कि स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को प्रशिक्षण, ऋण और अन्य आवश्यक सहयोग दिया जा रहा है। जनपद में कई महिलाएं लखपति दीदी बन चुकी हैं। महिलाओं को गांव में ही रोजगार उपलब्ध कराने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।






