Uttarakhand

IT इंजीनियर से सफल डेयरी उद्यमी बने हरिओम, 10 गायों से शुरू किया सफर, आज करोड़ों का कारोबार

देहरादून के बरकोट गांव के युवा की सफलता की कहानी, बेंगलुरु से लाखों का पैकेज छोड़कर गांव की ओर किया रुख, डेयरी व्यवसाय शुरू कर खुद बने आत्मनिर्भर, 15 गांवों के 500 लोगों को भी दिया रोजगार

योगेंद्र मलिक

देहरादून, 7 अगस्त 2026ः

आज युवा अच्छे-अच्छे पैकेज की नौकरी छोड़कर गांवों की ओर रुख कर रहा है और अपने को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ बेरोजगारों को सहारा दे रहा है। ऐसा ही काम उत्तराखंड के देहरादून जनपद के बरकोट गांव निवासी हरिओम नौटियाल ने किया है। बेंगलुरु में वेब डेवलपर के रूप में एक लाख रुपये से अधिक का वेतन पाने वाले हरिओम ने वर्ष 2013-14 में कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ गांव लौटने का निर्णय लिया। शुरुआत में उन्हें लोगों की आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, लेकिन आज वही निर्णय उनकी पहचान बन चुका है। महज 10 से 12 गायों से शुरू किया गया उनका डेयरी व्यवसाय अब लगभग दो करोड़ रुपये के वार्षिक कारोबार तक पहुंच चुका है। साथ ही 15 गांवों के करीब 500 लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार उपलब्ध करा रहा है।

नौकरी छोड़कर गांव लौटने का साहस

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हरिओम नौटियाल ने कंप्यूटर साइंस में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद दिल्ली और बेंगलुरु की प्रतिष्ठित कंपनियों में लगभग चार वर्ष तक नौकरी की। कॉर्पोरेट क्षेत्र में उनका भविष्य सुरक्षित माना जा रहा था, लेकिन उनका मन गांव और कृषि आधारित उद्यम से जुड़ने का था। वर्ष 2013-14 में उन्होंने नौकरी छोड़कर अपने पैतृक गांव लौटने का फैसला किया। गांव लौटने पर लोगों ने उनके फैसले पर सवाल उठाए और कई ने उन्हें ताने भी मारे। परिवार और समाज की अपेक्षाओं के बीच उन्होंने अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। उन्होंने तय किया कि आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक सोच के साथ पशुपालन को लाभकारी व्यवसाय बनाया जा सकता है।
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व्यावहारिक अनुभव न होने से उठाना पड़ा नुकसान

करीब 10 से 15 लाख रुपये के शुरुआती निवेश से हरिओम ने अपने घर के पास एक गौशाला बनाई और 10 से 12 गायों के साथ डेयरी व्यवसाय शुरू किया। शुरुआत बेहद कठिन रही। उन्हें पशुपालन का व्यावहारिक अनुभव नहीं था। प्रतिदिन पर्याप्त मात्रा में दूध तो तैयार होता था, लेकिन खरीदार नहीं मिलते थे। कई बार 50 से 60 लीटर दूध बिना बिके रह जाता था और पूरे दिन की मेहनत के बाद मात्र 9 रुपये का लाभ हाथ लगता था। हालांकि उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने पशुपालन की आधुनिक तकनीकों को सीखा, विशेषज्ञों से सलाह ली और धीरे-धीरे अपने डेयरी फार्म को व्यवस्थित रूप दिया। इसी दौरान स्थानीय महिलाओं और अन्य पशुपालकों का सहयोग भी उन्हें मिलने लगा।

गुणवत्ता और पारदर्शिता से जीता ग्राहकों का भरोसा

हरिओम की सफलता का सबसे बड़ा आधार ग्राहकों का विश्वास बना। उन्होंने दूध की शुद्धता साबित करने के लिए अनोखी पहल की। ग्राहकों को मुफ्त में लैक्टोमीटर वितरित किए, ताकि वे स्वयं दूध की गुणवत्ता की जांच कर सकें। उन्होंने यह भरोसा भी दिया कि यदि दूध का घनत्व (डेंसिटी) 26 से कम पाया गया तो वह दूध पूरी तरह नि:शुल्क दिया जाएगा। इस पारदर्शी व्यवस्था का सकारात्मक प्रभाव पड़ा। लोगों का भरोसा बढ़ा और शुद्ध दूध की मांग लगातार बढ़ती गई। हरिओम ने गायों के लिए जैविक चारे का उपयोग शुरू किया और गुणवत्ता को व्यवसाय की सबसे बड़ी ताकत बनाया।
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आधुनिक तकनीक से बदली डेयरी की तस्वीर

व्यवसाय बढ़ने के साथ हरिओम ने अपने डेयरी फार्म को आधुनिक तकनीकों से सुसज्जित किया। दूध संग्रह, शीत भंडारण, प्रोसेसिंग और पैकेजिंग के लिए अत्याधुनिक मशीनें स्थापित की गईं। दूध को पहले विशेष स्टोरेज टैंकों में सुरक्षित रखा जाता है और फिर मशीनों की सहायता से पैक किया जाता है। उनकी डेयरी में तैयार होने वाले उत्पाद पूरी तरह स्वच्छ वातावरण में तैयार किए जाते हैं। यही कारण है कि ऋषिकेश और देहरादून के अनेक ग्राहक पिछले कई वर्षों से नियमित रूप से उनके उत्पाद खरीद रहे हैं। शुद्धता और गुणवत्ता ने उनके ब्रांड को मजबूत पहचान दिलाई।

‘धन्या धेनु’ बना भरोसे का नाम

हरिओम नौटियाल ने अपने डेयरी उत्पादों को ‘धन्या धेनु’ ब्रांड के तहत बाजार में उतारा। शुरुआत केवल दूध की बिक्री से हुई, लेकिन जल्द ही उन्होंने वैल्यू एडिशन पर ध्यान देना शुरू किया। आज उनके ब्रांड के अंतर्गत घी, पनीर, दही, मावा, खोया, रबड़ी, फालूदा, अचार, कैंडी और 20 से अधिक प्रकार की आइसक्रीम सहित अनेक उत्पाद तैयार किए जाते हैं। इन उत्पादों की पैकेजिंग और गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। आधुनिक कैपिंग और पैकिंग मशीनों के उपयोग से उत्पादों की गुणवत्ता लंबे समय तक सुरक्षित रहती है। स्थानीय बाजारों के साथ-साथ विभिन्न व्यापार मेलों में भी उनके उत्पादों को अच्छी पहचान मिल चुकी है।
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प्रोसेसिंग से बढ़ी आय

हरिओम का मानना है कि केवल कच्चा दूध बेचने से सीमित आय होती है। अधिक लाभ के लिए दूध का प्रसंस्करण (वैल्यू एडिशन) आवश्यक है। इसी सोच के साथ उन्होंने आधुनिक प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित की, जहां दूध से विभिन्न उत्पाद तैयार किए जाते हैं। इस पहल से न केवल उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, बल्कि उनसे जुड़े पशुपालकों को भी अपने दूध का बेहतर मूल्य मिलने लगा।

सरकारी योजनाओं का मिला लाभ

वर्ष 2016 में हरिओम ने दूध संग्रह केंद्र की स्थापना की और विभिन्न सरकारी योजनाओं व सब्सिडी का लाभ उठाया। उन्होंने अनुसूचित जाति की महिलाओं, विधवाओं और छोटे पशुपालकों को भी अपने उद्यम से जोड़ा। इससे ग्रामीण महिलाओं की आय बढ़ी और स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर विकसित हुए। बाद में उन्होंने डेयरी के साथ गोट फार्मिंग, कृषि और खाद्य प्रसंस्करण को भी अपने व्यवसाय का हिस्सा बनाया।

500 लोगों को मिला रोजगार

आज हरिओम नौटियाल का उद्यम केवल एक डेयरी फार्म नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास का सफल मॉडल बन चुका है। उनके व्यवसाय से प्रतिदिन लगभग 250 लीटर दूध की बिक्री होती है। देहरादून और ऋषिकेश के बाजारों में उनके उत्पादों की अच्छी मांग है। उनका वार्षिक कारोबार लगभग दो करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि उनके प्रयासों से 15 गांवों के लगभग 500 लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिल रहा है।

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Anurag Chaturvedi

अनुराग चतुर्वेदी पिछले कई वर्षों से पत्रकारिता, लेखन और संपादन के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं। उन्होंने विभिन्न प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए खबरों को निष्पक्षता और गहराई के साथ जनता के सामने रखा है।

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