
लखनऊ, 2 सितंबर 2026:
यूपी की राजधानी लखनऊ में स्वाइन फ्लू (H1N1) का संक्रमण लगातार पैर पसार रहा है। चार नए मरीजों में स्वाइन फ्लू की पुष्टि हुई। इसके साथ ही इस सीजन में राजधानी में एच1एन1 संक्रमित मरीजों की संख्या बढ़कर 21 हो गई है। संक्रमण की चपेट में आई एक महिला मरीज की बलरामपुर अस्पताल में मौत भी हो चुकी है। बढ़ते संक्रमण के बीच स्वास्थ्य विभाग ने मरीजों को कुछ राहत देते हुए निजी अस्पतालों और पैथोलॉजी केंद्रों में स्वाइन फ्लू की आरटीपीसीआर जांच की अधिकतम दर 3,000 रुपये तय कर दी है।
स्वास्थ्य विभाग को शिकायतें मिल रही थीं कि कई निजी अस्पताल और पैथोलॉजी सेंटर स्वाइन फ्लू की आरटीपीसीआर जांच के लिए मरीजों से मनमाने पैसे वसूल रहे हैं। कई केंद्रों पर जांच के नाम पर करीब 6,000 रुपये तक लिए जाने की बात सामने आई थी। महंगी जांच के कारण कई मरीज जांच कराने से भी बच रहे थे। शिकायतों के बाद स्वास्थ्य महकमा हरकत में आया और निजी क्षेत्र में जांच की दर निर्धारित करने के लिए प्रमुख अस्पतालों व पैथोलॉजी केंद्रों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की।
सीएमओ डॉ. एनबी सिंह की अध्यक्षता में जूम के माध्यम से हुई बैठक में मेदांता हॉस्पिटल, अपोलो मेडिक्स हॉस्पिटल, आरएमएल पैथोलॉजी, मैक्स हॉस्पिटल, खन्ना डायग्नोस्टिक, चंदन हॉस्पिटल, चरक डायग्नोस्टिक और लाल पैथ लैब समेत अन्य संस्थानों के प्रतिनिधि शामिल हुए। बैठक में स्वाइन फ्लू की आरटीपीसीआर जांच के शुल्क को लेकर चर्चा हुई और अधिकतम दर 3,000 रुपये तय की गई।
सीएमओ ने बताया कि एसजीपीजीआई में इसी जांच के लिए 2,400 रुपये शुल्क निर्धारित है। इसी आधार पर निजी अस्पतालों और पैथोलॉजी केंद्रों के लिए जांच की अधिकतम दर तय की गई है। निर्धारित दर से अधिक शुल्क लेने वाले केंद्रों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इससे मरीजों को जांच कराने से पहले ही शुल्क की जानकारी मिल सकेगी और मनमानी वसूली पर अंकुश लगेगा।

चार नए मरीजों में दो महिलाएं और दो पुरुष
लखनऊ में मंगलवार को मिले चार नए संक्रमितों में दो महिलाएं और दो पुरुष हैं। इनमें दो मरीजों की रिपोर्ट एसजीपीजीआई, एक महिला की लोहिया संस्थान और एक मरीज की निजी अस्पताल में पॉजिटिव आई। सभी संक्रमितों को आइसोलेशन वार्ड में भर्ती कर उपचार किया जा रहा है।
बढ़ते मामलों के बीच स्वास्थ्य विभाग की ओर से निजी जांच केंद्रों को निर्धारित दर के अनुरूप ही शुल्क लेने के निर्देश दिए जाएंगे। माना जा रहा है कि इससे जांच के नाम पर मरीजों और तीमारदारों पर पड़ रहा अतिरिक्त आर्थिक बोझ कम होगा और संक्रमण की समय पर पहचान में भी मदद मिलेगी।






