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पितृ पक्ष : किस तिथि को किसका करें श्राद्ध, तर्पण की विधि, अमावस्था का विशेष महत्व

हर साल भाद्रपद पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से होता है शुरू, आश्विन मास की अमावस्या आखिरी दिन, पूर्वजों की आत्मा की शांति व मोक्ष के लिए किया जाता है श्राद्ध कर्म, इस अवधि में नहीं होते कोई शुभ काम

न्यूज डेस्क, 28 सितंबर 2026ः

पितृ पक्ष का हर हिंदू परिवार के लिए विशेष महत्व है। इस पखवाड़े में अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं और उनको श्रद्धांजलि देते हैं। उनकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध कर्म करते है। मान्यता है कि ऐसे धार्मिक कार्य करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। हर साल पितृ पक्ष भाद्रपद पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से शुरू होकर आश्विन मास की अमावस्या तक रहता है। यह केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही एक परंपरा है, जो हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखती है। पितृ पक्ष की शुरुआत 27 सितंबर से हो चुकी है और इसकी समाप्ति तिथि 10 अक्तूबर है।

पितरों के लिए तर्पण करने की परंपरा

सुबह नहाने के बाद पितरों को याद करना चाहिए। परिवार के जिन पूर्वजों का निधन हो चुका है, उनको याद करें। उनके नाम का स्मरण करते हुए भगवान से उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृ पक्ष का सबसे बड़ा भाव ही पूर्वजों के प्रति सम्मान व कृतज्ञता से जुड़ा माना जाता है। पितृ पक्ष में तर्पण का विशेष महत्व है। जल में काले तिल डालकर पितरों को तर्पण किया जाता है। तर्पण के दौरान पितरों का स्मरण करें।

तर्पण कैसे करें, मंत्र व सामग्री

तर्पण के लिए दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। हाथ में कुशा घास, काले तिल और जल लेकर पितरों का नाम व गोत्र स्मरण करते हुए जल अर्पित करें। पितरों को जल देते समय हाथ की अंगुलियों के बीच से जल गिराया जाता है, जिसे ‘पितृ तीर्थ’ कहा जाता है। तर्पण तीन पीढ़ियों- पिता, दादा और परदादा के निमित्त किया जाता है। प्रत्येक के लिए अलग-अलग जल अर्पित किया जाता है। तर्पण में मुख्य रूप से जल, काले तिल, जौ, कुशा और पवित्री का उपयोग किया जाता है। मंत्रोच्चार के साथ ‘ओम पितृभ्यो नमः’ जैसे मंत्रों का जाप कर जल अर्पित करना चाहिए। यदि मंत्र याद न हों तो श्रद्धापूर्वक पूर्वजों का नाम लेकर भी जल अर्पित कर सकते हैं। तर्पण नदी, तालाब या घर पर भी विधिपूर्वक किया जा सकता है, इसके लिए किसी विशेष स्थान की बाध्यता नहीं है।

गरीबों, कौए व अन्य जीवों को कराएं भोजन

पितृ पक्ष में जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराना शुभ माना जाता है। भोजन सात्विक व सम्मानपूर्वक कराना चाहिए। कुछ लोगों में श्राद्ध के दिन ब्राह्मण को भोजन कराने की परंपरा है। जरूरतमंदों को भोजन कराने के अलावा दान-पुण्य देने की भी प्रथा है। अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, वस्त्र, फल व जरूरत की दूसरी चीजें दान में दी जा सकती हैं। बता दें कि श्राद्ध कर्म के दौरान कौए को भोजन कराने का भी विशेष उल्लेख किया गया है। कई परिवारों में श्राद्ध का भोजन सबसे पहले कौए, गाय व कुत्ते को देने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता में इन्हें पितरों से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि भोजन कराते समय पशु-पक्षियों के लिए सुरक्षित और उचित भोजन ही देना चाहिए।

पितृ पक्ष में श्राद्ध करने की तिथि

27 सितंबर को प्रतिपदा तिथि थी। इस दिन महालया, पितृ पक्ष प्रारंभ हुआ था। 28 सितंबर को द्वितीया तिथि है। आज द्वितीया श्राद्ध है। 29 सितंबर को तृतीया तिथि है। इस दिन तृतीया श्राद्ध है। 30 सितंबर को चतुर्थी तिथि है। इस दिन चतुर्थी श्राद्ध है। एक अक्तूबर को पंचमी तिथि है। इस दिन पंचमी श्राद्ध होगा। दो अक्टूबर को षष्ठी तिथि है। इस दिन लोग षष्ठी श्राद्ध करते हैं। तीन अक्टूबर को सप्तमी/अष्टमी दोनों हैं। इस दिन जीवित्पुत्रिका व्रत (जिउतिया) व अशोकाष्टमी भी पड़ रही है। यह व्रत विशेष रूप से बिहार, यूपी और झारखंड में महिलाएं अपनी संतान की दीर्घायु के लिए रखती हैं। इसी दिन जिन पूर्वजों का देहांत अष्टमी तिथि को हुआ हो, उनका श्राद्ध भी परंपरागत रूप से किया जाता है।
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चार अक्टूबर को नवमी तिथि है। इसे नवमी श्राद्ध व मातृ नवमी के नाम से भी जाना जाता है। यह दिन विशेष रूप से परिवार की उन महिलाओं के लिए समर्पित है जिनका देहांत हुआ हो। कई परिवार इस दिन को माता, दादी या नानी के श्राद्ध के लिए विशेष रूप से मानते हैं। पांच अक्टूबर को दशमी है। इस दिन दशमी श्राद्ध होता है। छह अक्टूबर को एकादशी है। इस दिन इंदिरा एकादशी व्रत भी है। सात अक्टूबर द्वादशी है। इस दिन सन्यासी श्राद्ध होता है। आठ अक्टूबर को त्रयोदशी है। इस दिन प्रदोष व्रत और मास शिवरात्रि व्रत है। नौ अक्टूबर को चतुर्दशी है। इस दिन दुर्मरण श्राद्ध होता है। दुर्मरण श्राद्ध उन लोगों के लिए होता है, जिनकी दुर्घटना, जल में डूबने, अग्निदाह, शस्त्र प्रहार, जहर, या किसी हिंसक घटना से मृत्यु होती है।

सर्व पितृ अमावस्था व पितृ विसर्जन

10 अक्टूबर को अमावस्या है। इस दिन को पितृ पक्ष का सबसे प्रभावशाली और अंतिम दिन माना जाता है। इसी दिन को पितृ विसर्जन भी कहा जाता है। इसका अर्थ है, पितरों को विधिवत विदाई देना। इस तिथि में ज्ञात-अज्ञात, सभी पूर्वजों का सामूहिक श्राद्ध किया जा सकता है। जो लोग पितृ पक्ष के पूरे पखवाड़े में किसी भी दिन श्राद्ध नहीं कर पाए हैं, उनके लिए अमावस्था का दिन सबसे उपयुक्त माना जाता है।

पितृ पक्ष का धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में पितरों को देवताओं के समान सम्मान दिया गया है। माना जाता है कि पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों की आत्माएं पृथ्वी पर अपने वंशजों के पास आती हैं और श्राद्ध, तर्पण व दान ग्रहण करके तृप्त होती हैं। मार्कण्डेय पुराण में उल्लेख किया गया है कि श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्ध कर्म से पितर प्रसन्न होकर समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। यही कारण है कि यह समय केवल एक रस्म नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की एक सांस्कृतिक परंपरा मानी जाती है।

पितृ ऋण से मुक्ति की अवधारणा

सनातन परंपरा में मनुष्य पर तीन प्रमुख ऋण बताए गए हैं। इसमें पहला देव ऋण, दूसरा ऋषि ऋण और तीसरा पितृ ऋण। पितृ पक्ष में श्राद्ध और तर्पण करके व्यक्ति पितृ ऋण से मुक्त होने का प्रयास करता है। यह माना जाता है कि जब तक यह ऋण नहीं चुकाया जाता, तब तक परिवार में सुख-समृद्धि में बाधाएं आती रहती हैं, इसलिए हर मनुष्य इस अवधि को पूरी निष्ठा व श्रद्धा के साथ निभाता है।

भारत में विभिन्न क्षेत्रों में पितृ पक्ष की परंपराएं

भारत के अलग-अलग हिस्सों में पितृ पक्ष अलग नामों व रीतियों से मनाया जाता है। कर्नाटक में इसे ‘मट्टू अमावस्था’ कहा जाता है। वहीं, तमिलनाडु में महालया अमावस्था पर लोग श्राद्ध करते हैं। केरल में इसे ‘बलि’ कहा जाता है। बंगाल में महालया के साथ ही दुर्गा पूजा के आगमन की तैयारी शुरू हो जाती है।

पितृ पक्ष में क्या न करें

नए वस्त्र, वाहन या घर की खरीदारी करने से बचें। इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य से बचना चाहिए, क्योंकि यह समय चातुर्मास और पितृ पक्ष दोनों के अंतर्गत आता है। बाल और नाखून कटवाने से परहेज करें। नए व्यवसाय या किसी बड़े कार्य की शुरुआत न करें। श्राद्ध कर्म के बिना भोजन ग्रहण करने से बचें, विशेषकर जिस दिन तर्पण करना हो। पितरों के सम्मान में अपशब्द या अनादरपूर्ण व्यवहार न करें।

गया पिंड दान का सबसे पवित्र स्थान

बिहार का गया पिंड दान के लिए सबसे प्रसिद्ध और पवित्र स्थान माना जाता है। यहां देश-विदेश से लोग अपने पितरों का पिंड दान करने आते हैं। ऐसी मान्यता है कि गया में पिंड दान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और उन्हें पितृ लोक में स्थायी शांति मिलती है। रामायण में उल्लेख मिलता है कि स्वयं भगवान श्रीराम ने अपने पिता राजा दशरथ के निधन के बाद उनकी आत्मा की मुक्ति के लिए गया में विधिवत पिंड दान किया था। इसी पौराणिक घटना के कारण गयाजी को पिंड दान का सबसे सिद्ध केंद्र माना जाता है। यहां स्थित विष्णुपद मंदिर में फल्गु नदी के तट पर आज भी हजारों परिवार अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध और पिंड दान संपन्न कराते हैं।

वाराणसी व हरिद्वार में भी श्राद्ध कर्म

यूपी के वाराणसी व उत्तराखंड के हरिद्वार में गंगा तट पर श्राद्ध व पिंड दान करने की सदियों पुरानी और प्राचीन परंपरा है। काशी को मोक्ष की नगरी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि यहां गंगा स्नान के साथ किया गया तर्पण पितरों को शांति और मुक्ति दिलाता है। इसी तरह हरिद्वार में हर की पैड़ी पर भी हर साल पितृ पक्ष के दौरान देशभर से हजारों लोग अपने पितरों का पिंडदान और तर्पण करने के लिए पहुंचते हैं।

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Anurag Chaturvedi

अनुराग चतुर्वेदी पिछले कई वर्षों से पत्रकारिता, लेखन और संपादन के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं। उन्होंने विभिन्न प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए खबरों को निष्पक्षता और गहराई के साथ जनता के सामने रखा है।

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