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दीपावली: जानिए इसकी महिमा और शुभ मुहूर्त, जुड़ी हैं कई परंपराएं

हर साल कार्तिक माह की अमावस्या तिथि को देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है यह पर्व, इस त्योहार को मनाने के पीछे कई धार्मिक व पौराणिक मान्यताएं, मां लक्ष्मी के स्वागत में बनाई जाती हैं आकर्षित रंगोलियां

न्यूज डेस्क, 7 नवंबर 2026:

दीपावली हिंदुओं का सबसे प्रमुख त्योहार है। यह पर्व हर साल कार्तिक माह की अमावस्या तिथि को देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है। इसे रोशनी का पर्व भी कहा जाता है। इस दिन लक्ष्मी-गणेश की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। घरों में लोग दीपक जलाते हैं और परिवार की खुशहाली और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। घरों में रंगोलियां बनाई जाती हैं और मिठाइयां बांटी जाती हैं। दीपावली को अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इस त्योहार को मनाने के पीछे धार्मिक और पौराणिक मान्यताएं भी जुड़ी हैं। जानिए दीपावली पर लक्ष्मी-गणेश के पूजन का शुभ मुहूर्त क्या है।

पूजन का शुभ मुहूर्त

दीपावली पर लक्ष्मी-गणेश पूजन का सबसे शुभ मुहूर्त शाम 5:54 से 7:50 तक रहेगा। ऐसी मान्यता है कि उत्तर दिशा में पूजन शुभ माना जाता है। अगर उत्तर दिशा में पूजा नहीं कर सकते हैं तो दक्षिण दिशा को छोड़कर किसी भी अन्य दिशा में दीपावली के दिन पूजा की जा सकती है।

पूजा की साम्रगी

लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति (मिट्टी, चांदी या अन्य धातु की), कुबेर जी की मूर्ति या चित्र (वैकल्पिक), लकड़ी की चौकी (आसन), लाल या पीला नया वस्त्र (चौकी पर बिछाने के लिए), कलश (तांबे, पीतल या मिट्टी का), आम के पत्ते (कलश के मुख को ढकने के लिए), नारियल का गोला (जिसे चुनरी या कलावा लपेटकर कलश पर रखा जाता है), रोली/कुमकुम व हल्दी, अक्षत (साफ और साबुत चावल), कलावा,जनेऊ (भगवान गणेश के लिए), इत्र, सुपारी, पान के पत्ते और लौंग-इलायची, चांदी का सिक्का या नए नोट, कमलगट्टे और कौड़ी/गोमती चक्र (माता लक्ष्मी को विशेष प्रिय), ताजे फूल (विशेषकर गुलाब, गेंदा और कमल के फूल), मिट्टी के छोटे दीये (पूरे घर और मंदिर के लिए), घी और सरसों का तेल, रुई की बत्ती, धूप और अगरबत्ती, कपूर, खील और बताशे, मिठाई और फल।

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पूजा विधि

सबसे पहले चौकी पर लाल रंग का एक साफ कपड़ा बिछाएं। इसके बाद कलश स्थापना करें। मां लक्ष्मी को कमल अतिप्रिय है। इसलिए चौकी पर चावल से अष्टदल कमल बनाएं। अगर कमल का फूल पूजन के लिए मिल जाता है तो चावल से अष्टदल कमल बनाना अनिवार्य नहीं है। एक लोटे में जल रखें और उसमें सुपारी, सिक्का, फूल, अक्षत (चावल) और हल्दी डालें। पांच आम के पत्ते लगाएं। अब एक नारियल को तिलक लगाएं और उस पर कलावा बांधे। इस नारियल को लोटे के ऊपर रख दें।

अब चौकी पर लक्ष्मी-गणेश को चावल का आसन देकर उनकी मूर्ति स्थापित करें। माता लक्ष्मी के बगल में सुपारी स्वरूप में भगवान विष्णु को विराजित करें। क्योंकि कहा जाता है कि माता लक्ष्मी का वास वही होता है, जहां भगवान विष्णु का वास होता है। इसके साथ ही जिन चीजों को धनतेरस के दिन खरीदा है उन्हें भी रख दें। दीपावली के दिन उनका भी पूजन किया जाता है। अगर सोना-चांदी नहीं खरीदा है तो पुराने चांदी के सिक्के जिसमें लक्ष्मी-गणेश बने हों उनको भी रख सकते हैं। धनतेरस के दिन जो बर्तन लिए हैं, उनका भी पूजन करें। इस तरह से चौकी तैयार हो जाएगी। अब देवी-देवताओं को फूल से जल के छीटे देकर स्नान कराएं। इसके बाद सरसों के तेल का एक बड़ा दीपक जलाएं। यह दीपक पूरी रात जलना चाहिए।

गणेश जी और भगवान विष्णु को वस्त्र के रूप में जनेऊ व मौली समर्पित करें। मां लक्ष्मी को लाल रंग की चुनरी अर्पित करें। सभी को तिलक लगाएं। तिलक के ऊपर अक्षत लगाएं। देवी-देवताओं को फूल चढ़ाएं। मां लक्ष्मी को कमल का फूल और श्रृंगार का सामान अर्पित करें। इसके बाद मां लक्ष्मी को आकर्षित करने वाली या उनकी प्रिय चीजें कमल गट्टे, गोमती चक्र, सुपारी, कौड़ी और हल्दी की गांठ अर्पित करें। इसके बाद मां लक्ष्मी को सप्त धान अर्पित करें। लक्ष्मी जी को सात अनाज (गेहूं, चावल, धनिया, धान, पीली सरसों, काली उड़द और मूंग दाल) अर्पित करें। मां लक्ष्मी को भोग के रूप में पान के पत्ते के ऊपर खील-बताशे रखें और अर्पित करें। इसके बाद पांच तरह के फल और पंच मेवा अर्पित करें।

भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने की खुशी

जानकारों के अनुसार दीपावली से जुड़ी सबसे लोकप्रिय मान्यता रामायण पर आधारित है। धार्मिक ग्रंथों और लोक परंपराओं के अनुसार भगवान श्रीराम को अपने पिता राजा दशरथ के वचन का पालन करने के लिए 14 वर्षों का वनवास स्वीकार करना पड़ा था। इस दौरान माता सीता और छोटे भाई लक्ष्मण भी उनके साथ वन गए थे। वनवास के अंतिम समय में लंकापति रावण ने माता सीता का हरण कर लिया था। माता सीता को रावण से मुक्त कराने के लिए भगवान श्रीराम ने वानरराज सुग्रीव, महाबलि हनुमान और वानर सेना की सहायता से लंका पर आक्रमण किया। इस भीषण युद्ध में राम ने रावण का वध कर दिया और माता सीता को उसकी कैद से मुक्त कराया।

रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे। मान्यता है कि उनके आगमन की खुशी में अयोध्यावासियों ने पूरे नगर को दीपों से सजाया था। घरों की छतों, गलियों और रास्तों पर दीप जलाकर भगवान श्रीराम का स्वागत किया गया था। चारों ओर उत्सव का वातावरण था और लोगों ने अपने आराध्य के लौटने की खुशी मनाई थी। इसी प्रसंग को दीपावली मनाने का प्रमुख कारण माना जाता है। जानकारों के अनुसार तभी से हर साल कार्तिक माह की अमावस्या को दीपक जलाकर दीपावली मनाने की परंपरा शुरू हुई।

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समुद्र मंथन से हुआ था मां लक्ष्मी का प्राकट्य

दीपावली का संबंध धन और समृद्धि की देवी मां लक्ष्मी से जुड़ा हुआ है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मां लक्ष्मी का प्राकट्य समुद्र मंथन के दौरान हुआ था। उनके प्रकट होने से देवताओं में प्रसन्नता छा गई। मां लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में स्वीकार किया। इसी पौराणिक प्रसंग के कारण मां लक्ष्मी को धन, ऐश्वर्य, वैभव और सौभाग्य की देवी के रूप में पूजा जाता है। दीपावली की अमावस्या की रात भक्त अपने घरों में लक्ष्मी पूजन करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

पौराणिक कथा के अनुसार एक समय देवताओं की शक्ति कमजोर हो गई थी। असुरों के बढ़ते प्रभाव के कारण देवता भयभीत हो गए थे। तब भगवान विष्णु की सलाह पर देवताओं व असुरों ने मिलकर क्षीरसागर का मंथन करने का निर्णय लिया। इसके लिए मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाया गया। भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार धारण करके पर्वत को आधार प्रदान किया।

अंधकार पर प्रकाश की विजय का पर्व

दीपावली का सबसे व्यापक आध्यात्मिक संदेश अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ना है। इस त्योहार में जलाया जाने वाला प्रत्येक दीपक केवल घर को रोशन करने का माध्यम नहीं है, बल्कि जीवन में ज्ञान, आशा और सकारात्मकता का प्रतीक भी माना जाता है। भारतीय संस्कृति में प्रकाश को ज्ञान और सत्य का प्रतीक माना गया है, जबकि अंधकार को अज्ञान, निराशा और नकारात्मकता से जोड़कर देखा जाता है। इसी कारण दीपावली केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि जीवन में सकारात्मकता, सद्भाव, ज्ञान और नई शुरुआत का संदेश देने वाला पर्व भी है।

महावीर भगवान को मिला था निर्वाण

जैन धर्म में दीपावली का विशेष महत्व है। जैन धर्म की मान्यता के अनुसार 24वें तीर्थकर भगवान महावीर ने कार्तिक अमावस्या के दिन पावापुरी में निर्वाण प्राप्त किया था। उनके निर्वाण के बाद लोगों ने दीये जलाकर इस घटना को याद किया। जैन धैर्म के लोग दीपावली का त्योहार महावीर भगवान के मोक्ष के कल्याणक के रूप में मनाते हैं।

मां काली की पूजा से जुड़ी मान्यता

पूर्वी भारत के कई हिस्सों और बंगाल में दीपावली की रात मां काली की विशेष पूजा की जाती है। मान्यता है कि मां काली ने राक्षसों का संहार करके संसार को उनके अत्याचारों से मुक्त कराया था। इसलिए बंगाल में अमावस्या की रात को काली पूजा का विशेष आयोजन करने की परंपरा है।

कैसे शुरू हुई रंगोली की परंपरा

इतिहासकारों के अनुसार रंगोली की शुरुआत कब और कैसे हुई, इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। रंगोली शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘रंगावली’ शब्द से मानी जाती है। इसका आशय रंगों की पंक्ति या रंगों की सजावटी रचना से जोड़ा जाता है। समय के साथ यह कला अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय परंपराओं व मान्यताओं के अनुसार विकसित होती गई। माना जाता है कि यह परंपरा घरों को सजाने की प्राचीन लोक कलाओं से विकसित हुई। भारत के अलग-अलग हिस्सों में लोग शुभ अवसरों पर घर के प्रवेश द्वार और पूजा स्थल पर विशेष आकृतियां बनाते हैं। इन आकृतियों के माध्यम से मंगलकामना, अतिथि सत्कार और धार्मिक आस्था व्यक्त की जाती थी।

प्राचीन समय में रंगोली बनाने के लिए आज की तरह बाजार में मिलने वाले रासायनिक रंगों का इस्तेमाल नहीं होता था। लोग चावल का आटा, हल्दी, कुमकुम, फूलों की पंखुड़ियां, मिट्टी और प्राकृतिक रंगों का उपयोग करते थे। दक्षिण भारत में कोलम बनाने के लिए चावल के आटे का इस्तेमाल आज भी कई घरों में किया जाता है। वहीं, पश्चिम और उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में रंगीन पाउडर, गेरू व फूलों से सजावटी आकृतियां बनाई जाती हैं।

अलग-अलग राज्यों में रंगोली के नाम

दीपावली जैसे बड़े त्योहारों पर इसका सबसे ज्यादा महत्व होता है। घर की सफाई और सजावट के बाद मुख्य द्वार पर रंगोली बनाना शुभ माना जाता है। यह घर में आने वाले मेहमानों के स्वागत के साथ-साथ देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का भी एक पारंपरिक तरीका है। ऐसी मान्यता है कि रंगोली के माध्यम से घर में सुख-समृद्धि व शुभता का स्वागत किया जाता है। रंगोली केवल घर की सजावट का माध्यम नहीं है, बल्कि भारतीय लोककला, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं से भी गहराई से जुड़ी हुई है। इसके रंगों और आकृतियों में शुभ संकेत, प्रकृति के प्रति सम्मान और मंगलकामना का भाव छिपा होता है। भारत के विभिन्न राज्यों में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। महाराष्ट्र व गुजरात में इसे रंगोली, तमिलनाडु में कोलम, आंध्र प्रदेश में मुग्गु, बंगाल में अल्पना, राजस्थान और मध्य प्रदेश के कई क्षेत्रों में मांडना व उत्तर प्रदेश में चौक पूरना कहा जाता है।

भगवान कृष्ण व रुक्मिणी से जुड़ी मान्यता

एक अन्य लोककथा में रंगों और सुंदर आकृतियों को भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी से जोड़ा जाता है। कुछ मान्यताओं के अनुसार भगवान कृष्ण की नगरी द्वारका में शुभ अवसरों पर जमीन को सुंदर चित्रों और रंगों से सजाया जाता था। इसी तरह की कथाएं रंगोली को धार्मिक उत्सवों और मंगल कार्यों से जोड़ती हैं।

दीपावली पर रंगोली बनाने का धार्मिक महत्व

दीपावली पर रंगोली बनाने के पीछे सबसे प्रमुख धार्मिक मान्यता मां लक्ष्मी के स्वागत से जुड़ी है। मान्यता है कि स्वच्छ और सुंदर घर में मां लक्ष्मी का वास होता है। इसलिए दीपावली से पहले घर की साफ-सफाई की जाती है और मुख्य द्वार को दीपों, फूलों और रंगोली से सजाया जाता है। कुछ लोग रंगोली में कमल के फूल, माता लक्ष्मी के चरणचिह्न व दीपक की आकृतियां बनाते हैं। रंगोली को घर में सकारात्मकता और मंगलभाव का प्रतीक भी माना जाता है।

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Anurag Chaturvedi

अनुराग चतुर्वेदी पिछले कई वर्षों से पत्रकारिता, लेखन और संपादन के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं। उन्होंने विभिन्न प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए खबरों को निष्पक्षता और गहराई के साथ जनता के सामने रखा है।

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