Lucknow City

लखनऊ विश्वविद्यालय में फीस वृद्धि पर उबाल, छात्रों का प्रदर्शन तेज, पुलिस हिरासत पर भड़का विवाद

40% से 200% तक फीस बढ़ोतरी का आरोप, छात्र संगठनों ने इसे शिक्षा के बाजारीकरण से जोड़ा, प्रशासन पर दमनात्मक कार्रवाई के आरोप

लखनऊ, 29 अप्रैल 2026:

लखनऊ विश्वविद्यालय में फीस वृद्धि के विरोध में छात्रों का आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा है। बुधवार को आइसा, एनएसयूआई और एससीएस से जुड़े छात्रों ने विश्वविद्यालय के गेट नंबर एक पर धरना प्रदर्शन कर अपनी नाराजगी जाहिर की। हालांकि, छात्रों का आरोप है कि धरना शुरू होने से पहले ही प्रॉक्टर राकेश द्विवेदी के निर्देश पर पुलिस को बुलाकर कई छात्रों को हिरासत में ले लिया गया। इससे माहौल और तनावपूर्ण हो गया।

प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि यह कार्रवाई केवल एक विरोध को रोकने तक सीमित नहीं है बल्कि इसके पीछे एक व्यापक राजनीतिक परियोजना काम कर रही है। इसके तहत सार्वजनिक शिक्षा को धीरे-धीरे बाजार के हवाले किया जा रहा है। छात्रों ने हालिया फीस वृद्धि और स्व-वित्तपोषित सीटों के विस्तार को इसी प्रक्रिया का हिस्सा बताया। उनका दावा है कि विभिन्न पाठ्यक्रमों में फीस में 40 प्रतिशत से लेकर 200 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की गई है। इससे आम और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों पर सीधा असर पड़ रहा है।

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आइसा लखनऊ विश्वविद्यालय इकाई के अध्यक्ष शान्तम ने कहा कि बिना किसी ठोस कारण छात्रों को हिरासत में लेना प्रशासन की जवाबदेही से बचने की कोशिश है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब छात्र फीस वृद्धि पर सवाल उठाते हैं तो संवाद के बजाय दमन का रास्ता अपनाया जाता है। वहीं, एनएसयूआई के राष्ट्रीय समन्वयक प्रिंस प्रकाश ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा हमला बताते हुए कहा कि यह केवल एक विश्वविद्यालय का मुद्दा नहीं, बल्कि देशभर में शिक्षा के निजीकरण की दिशा को दर्शाता है।

एससीएस के प्रतिनिधि तौकील गाजी ने भी फीस वृद्धि और स्व-वित्तपोषित सीटों के विस्तार को सामाजिक न्याय के खिलाफ बताया। उनका कहना है कि इस नीति से वंचित तबकों के लिए उच्च शिक्षा के दरवाजे बंद हो रहे हैं। यह बेहद चिंताजनक है।

छात्र संगठनों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि फीस वृद्धि वापस नहीं ली गई और दमनात्मक कार्रवाइयां जारी रहीं तो आंदोलन और व्यापक होगा। उनका कहना है कि यह संघर्ष केवल फीस के खिलाफ नहीं बल्कि शिक्षा के अधिकार और विश्वविद्यालय के लोकतांत्रिक चरित्र को बचाने की लड़ाई है। यह आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है।

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