लखनऊ/कानपुर, 19 मई 2026:
मोबाइल गेम्स, ऑनलाइन शॉपिंग और डिजिटल पेमेंट के दौर में अब मिट्टी की पारंपरिक गुल्लकें फिर से बच्चों की जिंदगी में दस्तक देने जा रही हैं। यूपी सरकार ने कानपुर के बिठूर की ऐतिहासिक माटीकला को नया जीवन देने के लिए एक अनोखी पहल शुरू की है। इसमें पारंपरिक मिट्टी की गुल्लकों को आधुनिक डिजाइन, आकर्षक रंगों और बच्चों की पसंद के अनुरूप नए स्वरूप में तैयार किया जा रहा है। इस अभियान का उद्देश्य सिर्फ एक उत्पाद बेचना नहीं बल्कि नई पीढ़ी को बचत, परिवार और भारतीय संस्कृति से जोड़ना भी है।
कभी दादी-नानी के दिए सिक्कों को सहेजने वाली मिट्टी की गुल्लक अब कार्टून कैरेक्टर, पशु-पक्षियों और पारंपरिक कलात्मक आकृतियों के साथ बच्चों के लिए आकर्षण का केंद्र बन रही है। जिला प्रशासन और आईआईटी कानपुर मिलकर इस पारंपरिक कला को आधुनिक बाजार से जोड़ने की दिशा में काम कर रहे हैं।
डीएम जितेन्द्र प्रताप सिंह ने बताया कि गुल्लक बच्चों में बचत की आदत विकसित करने का सबसे सरल माध्यम रही है। उन्होंने कहा कि आज के समय में बढ़ते अनावश्यक खर्चों और उपभोक्तावादी संस्कृति के बीच बच्चों को आर्थिक अनुशासन और बचत का संस्कार देना बेहद जरूरी हो गया है। यही सोच इस अभियान की मूल भावना है।
सीडीओ जे जैन के अनुसार योगी सरकार स्थानीय उत्पादों और पारंपरिक कारीगरों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। बिठूर की माटीकला को नई पहचान दिलाने के लिए डिजाइन, पैकेजिंग और मार्केटिंग पर विशेष फोकस किया जा रहा है ताकि स्थानीय कारीगरों को बेहतर आय और बड़ा बाजार मिल सके।
आईआईटी कानपुर के रंजीत सिंह रोजी शिक्षा केन्द्र प्रोजेक्ट के तहत कारीगरों को तकनीकी प्रशिक्षण और डिजाइनिंग सहायता दी जा रही है। परियोजना की कॉर्डिनेटर रीता सिंह ने बताया कि यह पहल केवल रोजगार तक सीमित नहीं है बल्कि पारंपरिक कला और नई पीढ़ी के बीच भावनात्मक रिश्ता कायम करने का प्रयास भी है। वहीं प्रोजेक्ट कॉर्डिनेटर शिखा तिवारी ने बताया कि कारीगरों को आधुनिक बाजार की जरूरतों के अनुसार प्रशिक्षित किया जा रहा है।
बिठूर के कुम्हार राम रतन कहते हैं कि पहले मिट्टी की गुल्लकों की मांग लगभग खत्म हो रही थी लेकिन नए डिजाइन आने के बाद लोगों की रुचि फिर बढ़ने लगी है। इससे कारीगरों में नई उम्मीद जगी है। जिला प्रशासन अब इन गुल्लकों को सरकारी कार्यक्रमों में स्मृति-चिह्न और उपहार के रूप में भी बढ़ावा देगा। इससे बिठूर की माटीकला को राष्ट्रीय पहचान मिलने की उम्मीद है।






