
लखनऊ, 10 अगस्त 2026:
बसपा प्रमुख एवं यूपी की पूर्व सीएम मायावती ने बेरोजगारी, सरकारी नौकरियों में रिक्त पदों और जंतर-मंतर पर छात्रों व बेरोजगार युवाओं के आंदोलन को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सरकारी विभागों में खाली पड़े लाखों पदों पर पेपरलीक और भ्रष्टाचार से मुक्त, पारदर्शी एवं समयबद्ध भर्ती प्रक्रिया तत्काल शुरू करने की मांग की है।

मायावती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सोमवार को जारी बयान में कहा कि बसपा सरकार के दौरान उत्तर प्रदेश में पुलिस और पंचायती राज विभाग में करीब सवा दो लाख नए सरकारी पद सृजित किए गए थे। उन्होंने दावा किया कि उनकी सरकार ने सरकारी नौकरियों की भर्ती पर लगी रोक भी हटाई थी। इससे सर्वसमाज के लाखों लोगों को सरकारी सेवाओं में अवसर मिला।
बसपा प्रमुख ने कहा कि वह लंबे समय से देश, खासकर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था, पिछड़ेपन, पलायन, महिला असुरक्षा, पेपरलीक और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर सरकारों से प्रभावी कदम उठाने की मांग करती रही हैं। उनके मुताबिक इन गंभीर समस्याओं के बावजूद सरकारों की कथित उदासीनता चिंताजनक है।
मायावती ने जंतर-मंतर पर छात्रों और बेरोजगार युवाओं के लंबे आंदोलन का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आंदोलन के जरिए बेरोजगारी और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दे राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आए हैं। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों से युवाओं की समस्याओं को गंभीरता से लेते हुए तत्काल समाधान की दिशा में कदम उठाने की अपील की।
उन्होंने सरकारी नौकरियों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत बताते हुए राष्ट्रीय संपत्तियों को निजी हाथों में बेचने की प्रक्रिया रोकने और सभी सरकारी विभागों में रिक्त लाखों पदों को समयबद्ध तरीके से भरने की मांग की। मायावती ने कहा कि यदि एक परिवार के एक सदस्य को भी सरकारी नौकरी मिलती है तो उससे सीधे तौर पर लाखों परिवारों को लाभ पहुंच सकता है।
उन्होंने कहा कि इससे एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों को भी सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा मिल सकेगी। मायावती ने सरकारों से ‘हर हाथ को काम’ की नीति को प्राथमिकता देने और लाभ कमाने की सोच के बजाय कल्याणकारी नीतियों को लागू करने की अपील की।
इसके साथ ही उन्होंने संसद के मौजूदा सत्र में जंतर-मंतर आंदोलन से जुड़े मुद्दों को लेकर जारी गतिरोध समाप्त करने की मांग की। उनका कहना है कि संसद में पर्याप्त बहस और चर्चा के बाद ही विधेयकों को कानून बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़नी चाहिए।






