
रायबरेली, 12 अगस्त 2026:
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अदम्य साहस दिखाने वाले अवध केसरी राणा बेनी माधव बक्श सिंह की वीरगाथा अब आधुनिक तकनीक के जरिए आने वाली पीढ़ियां देख और महसूस कर सकेंगी। रायबरेली के सलोन में विकसित हो रहा उनका भव्य स्मारक परिसर निर्माण के अंतिम चरण में पहुंच गया है। सभागार, पुस्तकालय, गेस्ट हाउस, एम्फीथिएटर और अत्याधुनिक लाइट एंड साउंड शो से सुसज्जित यह परिसर जिले को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पर्यटन के नए केंद्र के रूप में पहचान दिलाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह के मुताबिक परियोजना के पहले चरण में सभागार और पुस्तकालय का निर्माण करीब पूरा हो चुका है। इस चरण के लिए 20.09 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं और करीब 95 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। भवन का मुख्य ढांचा तैयार है। अब पुट्टी, पेंट, फॉल्स सीलिंग, वॉल पैनलिंग और पोर्च समेत अंतिम फिनिशिंग का काम चल रहा है। इसे इसी महीने पूरा करने का लक्ष्य है।
दूसरे चरण में स्मारक परिसर का और विस्तार किया जा रहा है। इसके लिए 12 करोड़ रुपये स्वीकृत हैं। करीब 65 प्रतिशत निर्माण पूरा हो चुका है। रिटेनिंग वॉल और बाउंड्री वॉल बन चुकी हैं। गेस्ट हाउस के भूतल की स्लैब और प्रथम तल की शटरिंग का काम पूरा हो चुका है। फाउंडेशन, ईएसएस और फायर रूम भी तैयार हो चुके हैं। एम्फीथिएटर सहित अन्य निर्माण और फिनिशिंग कार्य तेजी से जारी हैं।
स्मारक की सबसे खास विशेषताओं में आधुनिक लाइट एंड साउंड आधारित आंतरिक विकास शामिल है। इसके लिए 4 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं। लगभग 75 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। प्रकाश और ध्वनि तकनीक के माध्यम से राणा बेनी माधव के शौर्य, संघर्ष और बलिदान की गाथा को रोचक तरीके से प्रस्तुत किया जाएगा।

अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा किया था बड़ा मोर्चा
राणा बेनी माधव बक्श सिंह शंकरपुर रियासत के शासक और 1857 के विद्रोह के प्रभावशाली क्रांतिकारी नेताओं में शामिल थे। उन्होंने अवध के तालुकेदारों और जमींदारों को एकजुट कर अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष को मजबूत किया। 28 जून 1857 को नवाबगंज, बाराबंकी में अंग्रेजी सेना को शिकस्त देने के साथ उन्होंने चिनहट की लड़ाई में भी वीरता दिखाई। नवंबर 1858 में गोविंदपुर भीरा में करीब 10 हजार सैनिकों के साथ अंग्रेजों पर धावा बोलकर उन्होंने एक और महत्वपूर्ण विजय हासिल की।
लोकगीतों में जीवित है उनकी वीरता
उनकी वीरता आज भी ‘अवध मां राना भयो मर्दाना’ जैसे लोकगीतों में जीवित है। सलोन का यह स्मारक परिसर इसी अमर विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के साथ रायबरेली को विरासत, संस्कृति और इतिहास पर्यटन के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाएगा।






