लखनऊ, 14 जून 2026:
यूपी का गो संरक्षण मॉडल अब देश के साथ दुनिया के लिए भी मिसाल बनता जा रहा है। सीएम योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश में गो संरक्षण को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने की नीति ने देसी गायों को ग्रामीण समृद्धि और उद्यमिता का मजबूत आधार बना दिया है। यूपी में तैयार होने वाले पंचगव्य और आयुर्वेदिक उत्पाद अमेरिका, जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया, यूएई समेत कई देशों के बाजारों तक पहुंच चुके हैं।
प्रदेश में देसी गायों से तैयार किए जा रहे लगभग 200 प्रकार के उत्पाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रहे हैं। इनमें पंचगव्य घृत, ब्राह्मी घृत, गोमूत्र अर्क, घनवटी, च्यवनप्राश, गो घृत, शतधौता घृत और आयुर्वेदिक काजल जैसे उत्पाद शामिल हैं। प्राकृतिक जीवनशैली, आयुर्वेद और पारंपरिक भारतीय चिकित्सा पद्धति के प्रति बढ़ते वैश्विक आकर्षण ने इन उत्पादों की मांग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है।
यूपी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि गो संरक्षण को आर्थिक मूल्य से जोड़कर एक व्यवस्थित उद्योग का स्वरूप दिया गया है। गोबर, गोमूत्र, घी और पंचगव्य आधारित उत्पादों के निर्माण ने ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं। स्वयं सहायता समूह, गोशालाएं और छोटे उद्यमी इस क्षेत्र से जुड़कर अपनी आय बढ़ा रहे हैं।
गाजियाबाद के असीम रावत इसका प्रमुख उदाहरण हैं। सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में करियर शुरू करने वाले असीम ने देसी गायों के संरक्षण और उनसे जुड़े उत्पादों के निर्माण को अपना मिशन बनाया। सीएम योगी की प्रेरणा से शुरू हुई उनकी पहल आज ‘हेता (HETHA)’ ब्रांड के रूप में देश और विदेश के बाजारों तक पहुंच चुकी है। उनका मानना है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण और बेहतर मार्केटिंग के माध्यम से गो आधारित उत्पाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकते हैं।
यूपी का यह मॉडल अब अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणा बन रहा है। गुजरात, हरियाणा, केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पंजाब, तेलंगाना, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गोवा, ओडिशा और आंध्र प्रदेश समेत 15 से अधिक राज्यों के लोग यहां गो संरक्षण, नस्ल सुधार और गो आधारित उद्यमिता का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं।
पशुपालन विभाग के अपर मुख्य सचिव मुकेश मेश्राम के अनुसार सरकार उन्नत देसी नस्लों के पालन पर 50 प्रतिशत तक सब्सिडी उपलब्ध करा रही है। साहीवाल, गिर, गंगातीरी और थारपारकर जैसी नस्लों के संरक्षण एवं संवर्धन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। यही वजह है कि कभी आर्थिक बोझ समझी जाने वाली देसी गाय आज करोड़ों रुपये की गो इकोनॉमी की धुरी बनकर प्रदेश को नई पहचान दिला रही है।






