
राजकिशोर तिवारी
देहरादून, 28 सितंबर 2026:
उत्तराखंड की सदियों पुरानी जल संस्कृति और पारंपरिक जल स्रोतों को संरक्षित करने की दिशा में स्प्रिंग एंड रिवर रिजुवेनेशन अथॉरिटी (SARRA) ने बड़ा कदम उठाया है। जलागम प्रबंधन निदेशालय, देहरादून में आयोजित राज्य स्तरीय तकनीकी कार्यशाला में प्रदेश के सभी 13 जिलों से आए सोशल कॉर्डिनेटर्स व कनिष्ठ अभियंताओं को वैज्ञानिक व तकनीकी प्रशिक्षण दिया गया।
कार्यशाला में पहले चरण में राज्य के 54 ऐतिहासिक एवं पारंपरिक धारा-नौलों के पुनरुद्धार की कार्ययोजना प्रस्तुत की गई। इसके साथ ही यह स्पष्ट किया गया कि संरक्षण के नाम पर ऐतिहासिक संरचनाओं के मूल स्वरूप से कोई छेड़छाड़ नहीं होगी। विशेष रूप से मूल पत्थर की चिनाई और ऐतिहासिक ढांचे में सीमेंट आधारित हस्तक्षेप पर रोक रहेगी।
SARRA की एसीईओ कहकशां नसीम ने कहा कि धारा और नौले महज पानी के स्रोत नहीं हैं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान, लोकजीवन और प्राचीन स्थापत्य परंपरा के जीवंत प्रतीक हैं। उन्होंने स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी के साथ संरक्षण अभियान को जन-आंदोलन का स्वरूप देने पर जोर दिया। यूकॉस्ट के महानिदेशक एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. दुर्गेश पंत ने कहा कि पारंपरिक जल स्रोतों का पुनरुद्धार केवल निर्माण कार्य नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और पारिस्थितिकीय प्रक्रिया है। इसके लिए स्प्रिंगशेड प्रबंधन, रिचार्ज जोन का वैज्ञानिक अध्ययन, चाल-खाल और हाइड्रो-जियोलॉजिकल तकनीकों के बीच समन्वय जरूरी है।
कार्यशाला में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के डॉ. नागेंद्र रावत ने ‘जीरो-सीमेंट स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग’ पर तकनीकी व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि प्राचीन नौलों में पत्थरों की कॉर्बेलिंग और लोड-बेयरिंग तकनीक का उपयोग किया जाता था, जो पारंपरिक निर्माण ज्ञान और भूकंपीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित हुई थी। विरासत संरक्षण विशेषज्ञ अंजलि भरथरी (INTACH) व संरक्षण वास्तुकार ए. विजया ने प्रतिभागियों को पारंपरिक निर्माण सामग्री के परीक्षण, साइट मैपिंग और विरासत संरक्षण के अंतरराष्ट्रीय मानकों की जानकारी दी।
कार्यशाला में सोशल कॉर्डिनेटर्स को जियो-टैगिंग, GIS मैपिंग और डेटा संग्रहण का प्रशिक्षण दिया गया। साथ ही ग्राम पंचायतों के सहयोग से रिचार्ज जोन में चाल-खाल और कंटूर ट्रेंच विकसित करने पर जोर दिया गया। SARRA की इस पहल में उत्तराखंड की प्राचीन जल-संस्कृति, पारंपरिक ‘जल मंदिर’ वास्तुकला और आधुनिक भू-जल विज्ञान को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया गया है। 54 ऐतिहासिक धारा-नौलों से शुरू होने वाला यह संरक्षण अभियान प्रदेश की पारंपरिक जल विरासत को संरक्षित करने के साथ-साथ भविष्य की जल सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण आधार तैयार कर सकता है।






