Raebareli City

डलमऊ में 700 साल से नहीं खेली जाती होली… पसरा रहता है सन्नाटा, मनाते हैं शोक, जानें वजह

राजा डल देव की शहादत से जुड़ी है 28 गांवों में होली न मनाने की परंपरा, सूने रहते हैं इलाके, अबीर-गुलाल से दूर रहते हैं लोग, महिलाएं श्रृंगार तक नहीं करतीं

विजय पटेल

रायबरेली, 4 मार्च 2026

जिले की डलमऊ तहसील में होली का एक अलग ही रंग दिखता है। जहां पूरे देश में बसंत पंचमी के बाद से ही होली की तैयारियां शुरू हो जाती हैं और लोग रंगों के त्योहार का बेसब्री से इंतजार करते हैं, वहीं डलमऊ क्षेत्र के करीब 28 गांवों में होली के दिन उत्सव नहीं बल्कि शोक मनाया जाता है। इन गांवों में होली के दिन न तो गुलाल उड़ता है और न ही ढोल-नगाड़ों की आवाज सुनाई देती है। पूरा इलाका गमगीन रहता है और लोग सादगी के साथ दिन बिताते हैं।

राजा डल देव और सलमा की प्रेम कथा से जुड़ी मान्यता

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कारोबारी व स्थानीय निवासी सूर्यकांत मिश्रा के मुताबिक यह परंपरा करीब 700 साल पुरानी है। डलमऊ के राजा डल देव को जौनपुर के शासक शाह शर्की की पुत्री सलमा से मोहब्बत हो गई थी। बताया जाता है कि राजा सलमा को अपने महल ले आए थे। इस बात से नाराज होकर जौनपुर के शासक ने कई बार डलमऊ किले पर हमला किया, लेकिन हर बार उसे नाकामी हाथ लगी।

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होली के दिन हुआ था हमला

नाकामी मिलने पर चालाकी से जानकारी जुटाकर होली के दिन ही डलमऊ पर हमला किया गया। उस समय राजा डल देव अपनी प्रजा और सैनिकों के साथ होली का उत्सव मना रहे थे। बताया जाता है कि लगभग 200 सैनिकों के साथ राजा डल देव ने करीब 2000 सैनिकों वाली दुश्मन सेना का डटकर मुकाबला किया। बहादुरी से लड़ते हुए वह युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए।

शहादत की याद में नहीं मनती होली

राजा की शहादत की याद में आज भी डलमऊ तहसील के 28 गांवों में होली के दिन मातम मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं श्रृंगार नहीं करतीं और कोई रंग या अबीर नहीं खेला जाता। गांवों में सन्नाटा छाया रहता है। चार दिन बाद इन गांवों में होली का त्योहार सादगी के साथ मनाया जाता है। स्थानीय लोग इसे अपनी परंपरा और शहादत की निशानी मानते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी इस रिवाज को निभाते आ रहे हैं।

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