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जब धोती-कुर्ता पहनकर अंग्रेजों को चटाई धूल… लगान के 25 साल, जानिए ऑस्कर तक का रोचक सफर

आमिर खान ने सबकी सलाह ठुकराकर लगाया था बड़ा दांव, लगान ने भारतीय सिनेमा को एकेडमी अवार्ड्स की दहलीज तक पहुंचाया

एंटरटेनमेंट डेस्क, 16 जून 2026:

एक फिल्म जिसमें न कोई सुपरहीरो था, न आधुनिक तकनीक का चकाचौंध भरा तमाशा था। थे तो सिर्फ कुछ किसान, एक सूखा पड़ा गांव और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खुद के सम्मान की लड़ाई। जब पर्दे पर ‘लगान’ चली तो उसने साबित कर दिया कि अच्छी फिल्में बड़े बजट से नहीं बल्कि बेहतरीन कहानी, कुशल निर्देशन एवं टीमवर्क से बनती हैं। हाल ही में फिल्म के सिल्वर जुबली के मौके पर मुंबई में पूरी स्टारकास्ट का एक बेहद इमोशनल और ग्रैंड रीयूनियन हुआ जिसमे लगान की 4K फॉर्मेट में विशेष स्क्रीनिंग हुई।

लगान भारत की उन चुनिंदा फिल्मों में से है जो ऑस्कर के टॉप-5 (बेस्ट फॉरेन लैंग्वेज फिल्म) तक पहुंची। जब लॉस एंजिल्स में एकेडमी अवॉर्ड्स का आयोजन हुआ तो आमिर खान और निर्देशक आशुतोष गोवारिकर हॉलीवुड का पारंपरिक टक्सीडो (सूट) पहनकर नहीं बल्कि भारतीय पारंपरिक धोती-कुर्ता और बंदगला पहनकर रेड कारपेट पर उतरे थे। विदेशी मीडिया भारतीय संस्कृति के इस अनूठे रूप को देखकर दंग रह गया था।

25 Years of Lagaan Celebrating Indian Cinema (1)

साल 2001 का दौर बॉलीवुड के लिए अलग था। पर्दे पर प्रेम कहानियों, एक्शन और मसाला फिल्मों का दबदबा था। ऐसे समय में एक ऐसी फिल्म बनाना जिसकी कहानी 19वीं सदी के एक गांव में घटित होती हो और जिसका केंद्र क्रिकेट का खेल हो, किसी बड़े जोखिम से कम नहीं था।

निर्देशक आशुतोष गोवारिकर के पास फिल्म की ऐसी स्क्रिप्ट थी जिस पर लोगों को भरोसा नहीं था। खुद जावेद अख्तर भी आमिर खान को इसे करने से मना कर चुके थे लेकिन आमिर को यकीन था कि कहानी अलग और दमदार है। उन्होंने फिल्म को प्रोड्यूस किया। लगान की सफलता ने वो इतिहास रचा जिसने इंडियन सिनेमा को ढर्रे से अलग फिल्में बनाने के लिए सोचने पर मजबूर किया।

फिल्म की कहानी जितनी सरल थी उसका असर उतना ही गहरा था। चंपानेर नाम का एक गांव जहां सूखे ने लोगों की जिंदगी मुश्किल बना दी थी। ऊपर से अंग्रेजों का बढ़ता हुआ लगान। ऐसे हालात में गांव का एक युवक भुवन अन्याय के सामने झुकने से इनकार कर देता है। वह अंग्रेजों की चुनौती स्वीकार करता है और क्रिकेट के मैदान को अपने गांव की किस्मत बदलने की जंग का मैदान बना देता है।

फिल्म में स्पिन बॉलर कचरा (आदित्य लाखिया) का किरदार भारतीय सिनेमा के सबसे सशक्त किरदारों में से एक है। शुरुआत में इस किरदार को फिल्म में रखने पर कई लोगों को आपत्ति थी कि यह कहानी को भटका सकता है। लेकिन आमिर खान अड़े रहे। उन्होंने कहा कि यह फिल्म सिर्फ क्रिकेट की नहीं बल्कि सामाजिक एकता और भेदभाव को मिटाने की कहानी है। आखिरकार कचरा की हैट्रिक वाले दृश्य ने थिएटर में बैठे दर्शकों को भावुक कर दिया।

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25 साल पूरे होने पर फिल्म के विलेन कैप्टन रसेल (पॉल ब्लैकथॉर्न) संग एलिजाबेथ (रैचेल शैली) विशेष रूप से लंदन से मुंबई आए। पॉल ने हंसते हुए उस वक्त को याद किया कि शूटिंग के दौरान भुज की गर्मी से उनका बुरा हाल हो जाता था। आज भी पॉल को ‘तीन गुना लगान’ वाला अपना डायलॉग हूबहू याद है।

एआर रहमान के सुरों और जावेद अख्तर के शब्दों ने फिल्म को ऊंचाई दी, जहां ‘घनन-घनन’ में बारिश की आस थी, ‘ओ पालनहारे’ में विश्वास था तो वहीं ‘चले चलो’ में वह जोश था जिसने दर्शकों को अपनी जगह से हिलने का मौका नहीं दिया। लगान ने सिखाया कि अगर इरादे मजबूत हों तो टूटे हुए बल्ले और बिना जूतों के भी दुनिया की सबसे बड़ी ताकत को घुटनों पर लाया जा सकता है।

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