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Lucknow Fire Tragedy: कफ़न ओढ़े दफन हो गए दो नौजवान, चिता की लपटों ने चीर दिया दिल

लखनऊ अलीगंज की पुरनिया स्थित बिल्डिंग में भविष्य का ताना-बाना तैयार कर रहे थे बाराबंकी के दो और सीतापुर का एक युवक, शव पहुंचने के बाद गम और गुस्से के बीच दी गई अंतिम विदाई, मां-बाप और भाई-बहनों की चीखों ने हर आंख नम कर दी

बाराबंकी/ सीतापुर, 24 जून 2026:

लखनऊ के अलीगंज स्थित पुरनिया इलाके की इमारत में लगी भीषण आग ने तीन परिवारों की दुनिया उजाड़ दी। हादसे में बाराबंकी के मोहम्मद शहजान और मोहम्मद अम्मार के साथ सीतापुर के आदित्य श्रीवास्तव की मौत के बाद उनके शव घर पहुंचे तो हर तरफ चीख-पुकार और मातम का माहौल था। दो जनाजे नम आंखों के बीच सुपुर्द-ए-खाक किए गए, जबकि आदित्य की चिता से उठती लपटों ने परिजनों के कलेजे को छलनी कर दिया।

बेटे का सेहरा देखने का सपना अधूरा रह गया

बाराबंकी के लखपेड़ाबाग निवासी मोहम्मद अम्मार की अगले साल मार्च में शादी होनी थी। कुछ दिन पहले ही उनकी मंगनी हुई थी। पिता मंसूर आलम रुंधे गले से कहते हैं कि उन्होंने बेटे के सिर पर सेहरा देखने का सपना संजोया था, लेकिन किस्मत ने ऐसा दर्द दिया कि उन्हें अपने जवान बेटे का जनाजा कंधे पर उठाना पड़ा। अम्मार के छोटे भाई उमेर की आंखें बार-बार भर आती हैं। वह कहते हैं कि भाई हर कदम पर उनका हौसला बढ़ाते थे। बीटेक की पढ़ाई में भी वह हमेशा मदद करते थे। अब घर का सबसे बड़ा सहारा ही चला गया।
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तीन बहनों का इकलौता भाई, हमेशा के लिए खामोश हो गया शहजान

फतेहपुर कस्बे के मोहम्मद शहजान तीन बहनों के इकलौते भाई थे। एनिमेशन और एडवरटाइजिंग का कोर्स सीख रहे शहजान रोज की तरह कोचिंग गए थे, लेकिन वापस नहीं लौट सके। उनका शव घर पहुंचा तो बहनों और परिजनों की चीखों से माहौल गमगीन हो गया। नम आंखों के बीच उन्हें कस्बे के कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया।
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‘अपाहिज हो जाता तो जीवन भर सेवा करती लेकिन वो तो चला ही गया’

सीतापुर के बिसवां निवासी 21 वर्षीय आदित्य श्रीवास्तव का अंतिम संस्कार मुक्तिधाम में किया गया। चिता को मुखाग्नि देते समय परिवार के आंसू थम नहीं रहे थे। मां कल्पना श्रीवास्तव का दर्द शब्दों में नहीं समा रहा था। वह रोते हुए कहती हैं कि अगर उनका बेटा घायल या अपाहिज भी हो जाता तो वह जिंदगी भर उसकी सेवा करतीं, लेकिन अब कोई सहायता राशि उनका बेटा वापस नहीं ला सकती।
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छोटी बहन निष्ठा बार-बार भाई के शव से लिपटकर उसे उठने के लिए कहती रही। उसकी सिसकियां वहां मौजूद लोगों को भी रुला गईं। निष्ठा का आरोप है कि अगर समय रहते मदद पहुंचती तो शायद उसका भाई आज जिंदा होता।

गम के साथ गुस्सा भी, परिवार पूछ रहे कब खत्म होगी लापरवाही?

तीनों परिवारों में सिर्फ मातम ही नहीं, व्यवस्था के प्रति नाराजगी भी है। किसी ने बेटे का सेहरा देखने का सपना खो दिया, किसी की बहनों ने अपना इकलौता भाई खो दिया तो किसी मां की गोद हमेशा के लिए सूनी हो गई। एक तरफ दो नौजवान सफेद कफन ओढ़कर मिट्टी में दफन हो गए, दूसरी तरफ आदित्य की चिता की लपटों के साथ एक परिवार की उम्मीदें भी राख हो गईं। पीछे रह गए हैं सिर्फ सवाल, आंसू और उन अपनों की यादें, जिनकी जिंदगी की शुरुआत ही हुई थी।
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