
लखनऊ, 21 अगस्त 2026:
इतिहास की किताबों में दर्ज अतीत को अब विद्यार्थी पढ़ने के साथ ही उसे समझने और उसके संरक्षण की तकनीक भी सीखेंगे। उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय की ओर से विद्यार्थियों, शोधार्थियों और इतिहास प्रेमियों के लिए ‘पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम’ शुरू किया गया है। कैसरबाग में छतर मंजिल परिसर स्थित पुरातत्व निदेशालय के सभागार में शुरू हुए करीब दो सप्ताह के पाठ्यक्रम का समापन 3 सितंबर को प्रमाणपत्र वितरण के साथ होगा।
पाठ्यक्रम के उद्घाटन में 100 से अधिक प्रतिभागियों ने ऑफलाइन और 50 से अधिक ने ऑनलाइन माध्यम से सहभागिता की। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व अधीक्षण पुरातत्वविद् एवं पद्मश्री डॉ. नारायण व्यास ने अपने की-नोट व्याख्यान में कहा कि विरासत संरक्षण केवल सरकार या पुरातत्व विशेषज्ञों की जिम्मेदारी नहीं है। युवा पीढ़ी और समाज की सक्रिय भागीदारी से ही ऐतिहासिक धरोहरों को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाया जा सकता है।

उन्होंने विद्यार्थियों से अपने आसपास मौजूद प्राचीन स्थलों, स्मारकों, पुरावशेषों और सांस्कृतिक परंपराओं को लेकर जिज्ञासा विकसित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इतिहास और पुरातत्व एक-दूसरे के पूरक हैं। इनके माध्यम से हम अपने पूर्वजों की समृद्ध विरासत को पहचान और समझ सकते हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता लखनऊ विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. किरन कुमार थपल्याल ने की। पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि आगामी सत्रों में प्रतिभागियों को पुरातत्व के कई रोचक और महत्वपूर्ण पहलुओं से रूबरू कराया जाएगा। जयवीर सिंह के मुताबिक यह पहल युवाओं को पुरातत्व को महज इतिहास पढ़ने के बजाय वैज्ञानिक अध्ययन, खोज और विरासत संरक्षण के व्यापक क्षेत्र के रूप में समझने का अवसर देगी। इसके साथ ही शिक्षकों और विद्यार्थियों के माध्यम से प्रदेश में ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति जागरूकता को भी नई मजबूती मिलेगी।
पाठ्यक्रम में प्राचीन ईंट निर्मित संरचनाओं, पाषाण उपकरणों से धातु तक प्रागैतिहासिक संस्कृतियों के विकास, पुरावशेष एवं स्मारक संरक्षण के कानूनी प्रावधानों और भारत के ईंट निर्मित स्तूपों पर विशेषज्ञ व्याख्यान होंगे। महाराष्ट्र के नालासोपारा स्तूप और उसके संरक्षण की चुनौतियों पर भी चर्चा होगी।
इसके अलावा सरस्वती-सिंधु सभ्यता, भारतीय ज्ञान परंपरा, वैज्ञानिक तरीकों से मानव अतीत की पड़ताल, भारतीय चित्रकला में प्रेम-विरह और नायक-नायिका चित्रण जैसे विषय भी पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं। सरयू-पार क्षेत्र के प्राचीन बसावट पैटर्न के जरिए बलरामपुर, बहराइच, गोंडा और श्रावस्ती के पुरातात्विक महत्व को समझाया जाएगा।
सिक्कों के इतिहास, गुजरात के राज्य संरक्षित स्मारकों, सिरपुर के पुरातात्विक महत्व, कोणार्क की मूर्तिकला और अधूरे स्थापत्य तथा आपातकालीन संरक्षण एवं ‘सैल्वेज ऑपरेशन’ पर भी विशेषज्ञ जानकारी देंगे। व्याख्यानों के साथ डेमोंस्ट्रेशन भी होंगे। इससे प्रतिभागियों को पुरातत्व के व्यावहारिक पक्ष को समझने का मौका मिलेगा। विभिन्न सत्रों में पद्मश्री डॉ. नारायण व्यास, डॉ. अनिल कुमार, इंदु प्रकाश, डॉ. राजेंद्र यादव, डॉ. नीरज राय, डॉ. नरेंद्र परमार, डॉ. विजय माथुर, डॉ. दुर्गेश कुमार श्रीवास्तव, साधना व्यास, डॉ. विनय कुमार सिंह, डॉ. पंकज शर्मा, डॉ. प्रवीण कुमार मिश्रा, डॉ. राजीव द्विवेदी और पद्मश्री डॉ. बीआर मणि समेत कई विशेषज्ञ अपने अनुभव साझा करेंगे।






