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‘धत्त तेरे की’ ने हंसाते-हंसाते छेड़ा बड़ा सवाल : मानसिक रोगियों की पीड़ा व पहचान की तलाश पर गिरा नाट्य महोत्सव का पर्दा

थाने में जन्मे ‘पैदाइश’ की पहचान की तलाश से लेकर प्रेम और अपनत्व तक की कहानी ने दर्शकों को हंसाया, सोचने पर मजबूर भी किया, मुंबई के ABSS थिएटर ग्रुप ने दी प्रभावशाली प्रस्तुति

लखनऊ, 5 अक्टूबर 2026:

यूपी की राजधानी लखनऊ के गांधी भवन ऑडिटोरियम में तीन दिवसीय गांधी जयंती नाट्य महोत्सव के (36वें वार्षिक समारोह) का रविवार को रंगारंग और भावनात्मक समापन हुआ। अंतिम शाम मुंबई की चर्चित फिल्म एवं थिएटर संस्था अखिल भारतीय सांस्कृतिक संस्थान (ABSS) के कलाकारों ने वरिष्ठ रंगकर्मी, नाटककार, निर्देशक एवं अभिनय प्रशिक्षक राजेंद्र तिवारी के निर्देशन में नाटक ‘धत्त तेरे की’ का प्रभावशाली मंचन किया। हास्य, व्यंग्य और भावनाओं से भरपूर इस प्रस्तुति ने दर्शकों को जमकर गुदगुदाया लेकिन इसके साथ ही मानसिक रोगियों के प्रति समाज की उदासीनता, उपेक्षा और संवेदनहीन रवैये पर गंभीर सवाल भी खड़े किए।
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नाटक की सबसे खास बात यह रही कि गंभीर सामाजिक मुद्दे को बोझिल तरीके से नहीं अपितु हास्य और व्यंग्य की चाशनी में पेश किया गया। मंच पर कलाकारों की जीवंत अदाकारी, धारदार संवाद और घटनाओं की दिलचस्प गति ने दर्शकों को अंत तक बांधे रखा। कई दृश्यों में दर्शक ठहाके लगाते नजर आए, वहीं मानसिक रोगियों की पीड़ा और उनके प्रति समाज के रवैये को सामने लाने वाले प्रसंगों ने माहौल को भावुक कर दिया।

थाने में जन्मा ‘पैदाइश’, जिंदगी भर तलाशता रहा अपनी पहचान

‘धत्त तेरे की’ की कहानी एक थाने से शुरू होती है जहां एक महिला हवालात में बच्चे को जन्म देती है। बच्चे के जन्म के बाद उसकी मां की मौत हो जाती है। उसका नाम ‘पैदाइश’ रख दिया जाता है। मां के अभाव में थाने का हर नया इंचार्ज उसके लिए पिता की भूमिका निभाता है। समय के साथ पैदाइश बड़ा होता है। उसके मन में अपने पिता तथा अपनी पहचान को लेकर सवाल उठने लगते हैं।

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पुलिसवालों की हंसी-ठिठोली और सवालों को टालने के बीच उसे कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिलता। अपनी पहचान और रिश्तों की तलाश उसके भीतर बेचैनी पैदा करती है, जो धीरे-धीरे उसके मानसिक संतुलन को प्रभावित करती है। आखिरकार उसे पागलखाने में भर्ती करा दिया जाता है। यहां उसकी मुलाकात एक मानसिक रोगी लड़की से होती है और दोनों के बीच प्रेम पनपता है।

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कहानी तब नया मोड़ लेती है, जब पैदाइश थाने लौटकर नए इंचार्ज को अपनी प्रेम कहानी सुनाता है। दोनों की शादी करा दी जाती है और अंततः पैदाइश को बेटा स्वीकार कर लिया जाता है। नाटक का यह भावुक अंत रिश्तों, पहचान, अपनत्व और मानसिक रोगियों के प्रति समाज की जिम्मेदारी को लेकर दर्शकों को सोचने पर मजबूर करता है।

चार दशक से रंगमंच की साधना में जुटे हैं राजेंद्र तिवारी

नाटक के लेखक और निर्देशक राजेंद्र तिवारी वर्ष 1985 से रंगमंच से जुड़े हैं। मूल रूप से लखनऊ के रहने वाले तिवारी पिछले दो दशकों से मुंबई में ABSS थिएटर ग्रुप का संचालन कर रहे हैं। उन्होंने लखनऊ से मुंबई तक 5,000 से अधिक कलाकारों को नाट्य एवं अभिनय प्रशिक्षण दिया है। उनके मार्गदर्शन में प्रशिक्षित 250 से अधिक कलाकार आज फिल्म और टेलीविजन धारावाहिकों में काम कर रहे हैं।

कलाकारों की अदाकारी ने बांधा समां

क्रिएटिव डायरेक्टर निष्ठा तिवारी के मार्गदर्शन में रतिकांत दास, ललित पाण्डेय, निजाम हुसैन, राजपति साहू, शिव शेट्टी, केके अवस्थी, संजय यादव, दिलकश रिजवी, अमित, अश्वनी कुमार, आशी अग्रवाल, नेहा गुप्ता, मोनिका भारती, लक्ष्मी सोनी, अजय कुमार, आर्यन, शिवम, हेमंत सिंह गौर, ज्ञानेंद्र गुप्ता, एसके गौतम समेत अन्य कलाकारों ने पात्रों को जीवंत कर दिया। संवाद अदायगी और सामूहिक अभिनय को दर्शकों की खूब सराहना मिली।
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स्थानीय रंगकर्मियों व सहयोगियों की सक्रिय भूमिका

संस्था के अध्यक्ष अश्वनी कुमार शुक्ला की अगुवाई में आयोजित महोत्सव में स्थानीय रंगकर्मियों ललित पांडेय, संदीप मिश्रा, गणेश रावत, राकेश वर्मा, अमित तिवारी, अश्वनी विश्वकर्मा, राकेश तिवारी, दिलकश रिजवी, अंजना तिवारी, केके अवस्थी, अमरेन्द्र सहाय, इकबाल समेत अन्य सहयोगियों की सक्रिय भूमिका रही। ‘धत्त तेरे की’ के मंचन के साथ तीन दिवसीय गांधी जयंती नाट्य महोत्सव का समापन हुआ।

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Rakesh Kumar Verma

राकेश कुमार वर्मा एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। इन्हें मीडिया जगत में लगभग 31 वर्षों का व्यापक और समृद्ध अनुभव है। इन्होंने प्रिंट और डिजिटल दोनों ही माध्यमों में कार्य करते हुए अपनी मजबूत और प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई है। यूपी की राजधानी लखनऊ में स्वतंत्र भारत, राष्ट्रीय सहारा, जनसत्ता एक्सप्रेस,… More »

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